नूर जिहान ली: जब त्याग आशीष बन गया

धर्म का फैसला सचमुच अपना कब बनता है? ली जिंगहान के सामने यह प्रश्न 2012 में आया, जब नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में उनकी मुलाकात मुहम्मद ऐज़ात खालिस से हुई। ली अपने को अज्ञेयवादी कहती थीं; ऐज़ात मलय मुस्लिम परिवार से थे। रिश्ते की शुरुआत में उन्होंने साफ कहा कि विवाह तक पहुँचने के लिए ली को इस्लाम अपनाना होगा। फिर भी उन्होंने दबाव नहीं डाला—पहले सीखने और समझने को कहा।
वे प्रश्न जो टले नहीं
ली ने दारुल अरकम, मुस्लिम कन्वर्ट्स एसोसिएशन ऑफ सिंगापुर, का शुरुआती पाठ्यक्रम लिया और दो बार बीच में छोड़ दिया। उनके प्रश्न निजी और कठिन थे: हिजाब क्यों, माता-पिता के परलोक का क्या, भोजन और नमाज़ के नियम क्यों? उन्हें लगता था कि रिश्ते के लिए अपनी बहुत-सी बातें छोड़नी पड़ेंगी। इसी पर दोनों के बीच बहस होती रही।
ऐज़ात के परिवार ने उनकी स्वतंत्रता बनाए रखी। उनकी माँ ने कहा कि यदि ली इस्लाम न अपना सकें तो भी ठीक है, और विवाह उन्हें अपने माता-पिता से दूर नहीं करना चाहिए। इससे ली को अपने निर्णय तक पहुँचने की जगह मिली।
नज़र बदली तो अर्थ बदला
उनके अपने वर्णन में इन ज़िम्मेदारियों को देखने का नज़रिया बदला। जिन्हें पहले वे त्याग मानती थीं, उन्हीं में अब उन्हें बरकत दिखाई देने लगी। इस बदलाव के साथ वे इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार हुईं। स्रोत
उन्होंने 2015 में इस्लाम स्वीकार किया, नूर जिहान नाम अपनाया और उसी वर्ष ऐज़ात से विवाह किया। सिंगापुर के मुस्लिम कन्वर्ट्स एसोसिएशन का प्रकाशन भी उनके इस्लाम स्वीकार करने का वर्ष 2015 दर्ज करता है।
पहला रमज़ान
उन्होंने रमज़ान से लगभग दो सप्ताह पहले इस्लाम स्वीकार किया था। पाँच दैनिक नमाज़ों की आदत अभी बन ही रही थी कि रात की अतिरिक्त नमाज़ें शुरू हो गईं। उन्होंने थकान, दर्द और कभी-कभी रो पड़ने की बात ईमानदारी से कही। ससुराल वालों ने उन्हें धीरे चलने को कहा। एक वर्ष बाद नमाज़ उनके शरीर के लिए भी सहज हो चुकी थी।
उन्होंने अपने पति के आचरण में भी धर्म का असर देखा—माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति प्रेम, दया और उदारता। इससे उनके भीतर एक लक्ष्य बना: दूसरों के लिए “आशीष” बनना। बाद में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर नए मुसलमानों की मदद करने वाला ऑनलाइन मंच बनाने पर काम किया।
आस्था के साथ अपनी जड़ें
नूर जिहान ने इस्लाम अपनाने को अपनी चीनी पहचान से अलग होना नहीं माना। 2017 के एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी बेटी को परिवार की चीनी और मलय, दोनों संस्कृतियों से परिचित कराने की इच्छा बताई। जनवरी 2019 में उन्होंने अपने पिता ली सून कून की एक बातचीत साझा की। उनके बताए अनुसार, पिता ने बेटी के निर्णय का समर्थन करते हुए उसकी खुशी को सबसे अहम बताया था। परिवार का साथ उनकी सुनाई हुई कहानी का हिस्सा बना रहा।
यह कहानी प्रश्नों के एक रात में मिट जाने की नहीं है। यह उस स्वतंत्रता की कहानी है जिसमें प्रश्न परिपक्व हुए—और जो अभ्यास पहले रिश्ते की कीमत लगे, वही अंततः चुनी हुई आस्था बन गए।
स्रोत
- Channel NewsAsia — नूर जिहान और ऐज़ात का साक्षात्कार, 8 अगस्त 2017
- Muslim Converts’ Association of Singapore — What’s Next?, 2020
- Channel NewsAsia, पुनर्प्रकाशन — नूर जिहान का पहला रमज़ान
- AsiaOne — पिता के समर्थन के बारे में नूर जिहान का बताया प्रसंग, 24 जनवरी 2019
फ़ोटो: Bady Abbas / Unsplash.
