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अंतोनिया पेट्रा: एक उत्तर और साथ पाने की यात्रा

गरम रोशनी में मेज़ पर खुली हुई किताबें

अंतोनिया पेट्रा गागुलिच क्रोएशिया के ओसियेक शहर में एक ऐसे कैथोलिक परिवार में पली-बढ़ीं जहाँ आस्था रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा थी। उन्होंने अपने बचपन को सुखद बताया। कुछ समय तक पास में चर्च न होने के कारण उनके घर में ही प्रार्थना-सभा आयोजित होती थी। इस वातावरण ने उन्हें आस्था को जीते हुए देखना सिखाया और यह पूछने की आदत भी दी कि वह वास्तव में क्या मानती हैं और क्यों।

किशोरावस्था में उन्होंने मनोविज्ञान और व्यक्तिगत विकास पढ़ा तथा कई आध्यात्मिक विचारों और धर्मों का अध्ययन किया। इस खोज के बीच सृष्टिकर्ता में उनका विश्वास बना रहा। अरबी भाषा की कक्षा में पहुँचने पर उन्हें पता चला कि वह मस्जिद में आयोजित होती है। उनके अनुसार वह केवल भाषा की कक्षा थी, पर उस स्थान की छाप उनके साथ रही और अरबी सीखते रहने की इच्छा भी।

सत्रह वर्ष की उम्र में उनकी खोज अधिक केंद्रित हुई। मनुष्य और ईश्वर का संबंध, त्रित्व और ईसा की स्थिति उनके प्रमुख प्रश्न बने। अपने वृत्तांत में उन्होंने लिखा कि एक ईश्वर और ईसा को संदेशवाहक मानने की इस्लामी समझ ने उनके सवालों को संबोधित किया। पढ़ने और तुलना से विश्वास बढ़ा, और साथ ही यह चुनौती सामने आई कि जिस बात पर भरोसा बनने लगा है, उसे जीवन में कैसे जिया जाए।

शाहादा से पहले बहन से मिलने तुज़ला गईं तो अज़ान सुनी। उनके अनुसार, इससे बदलाव का संकल्प मज़बूत हुआ। लौटकर उन्होंने पढ़ना जारी रखा।

उन्होंने 2022 की शुरुआत को ऐसा समय बताया जब वह नमाज़ सीख रही थीं और आस्था के कुछ अभ्यास कर रही थीं, लेकिन परिवार से अपने बदलाव की बात करना कठिन था। वह अपनी भाषा और संस्कृति के किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहती थीं जो इसी रास्ते से गुज़रा हो। अंततः उनकी मुलाकात ओसियेक के दो क्रोएशियाई पुरुषों से हुई जिन्होंने इस्लाम अपनाया था। अब उनके पास अपने अनुभव पर बात करने वाले लोग थे।

इसके बाद मस्जिद जाना और इफ्तार की बैठकों में शामिल होना शुरू हुआ। उनकी आत्मकथा के अनुसार, माध्यमिक शिक्षा के अंत के निकट, रमज़ान 2022 के अंतिम तीसरे हिस्से में उन्होंने शाहादा पढ़ी। इस कदम ने परिवार के साथ कठिनाइयों को तुरंत समाप्त नहीं किया, लेकिन इसने उनके लंबे अध्ययन से निकले निर्णय को स्पष्ट कर दिया।

बाद के वृत्तांत में उन्होंने बताया कि 2023 में उन्होंने स्वतंत्र रूप से रहना और काम करना शुरू किया, फिर सारायेवो चली गईं। 2025 में अनादोलु से बातचीत में उन्होंने कहा कि परिवार के लिए उनका निर्णय स्वीकार करना कठिन था, जबकि बोस्निया और हर्ज़ेगोविना में उन्हें स्वागत करने वाला समुदाय मिला। उस समय वह मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रही थीं और सीखने का सिलसिला जारी था।

उन्होंने लिखा कि शरद 2023 में स्वतंत्र रहने पर खुलकर नमाज़ पढ़ सकीं और मोबाइल पर छिपकर पढ़ने के बजाय कुरआन की किताब खोल सकीं।

उनकी कहानी में बौद्धिक खोज और मानवीय साथ की आवश्यकता एक साथ आती है। पढ़ाई ने उन्हें अपने निर्णय को समझने में मदद दी; समान भाषा और अनुभव वाले लोगों ने अकेलापन कम किया। उनके वृत्तांत के दोनों पहलू महत्त्वपूर्ण हैं: कठिन प्रश्नों का उत्तर खोजना और बदलाव के समय किसी सुनने वाले को पाना।

स्रोत

फोटो: Ivona Rož / Unsplash.

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