मोहम्मद चेचेव: चियापास की पहाड़ियों में इस्लाम की ओर यात्रा

मेक्सिको के चियापास की पहाड़ियों में रहने वाले मैनुएल गोमेज़ ने मोहम्मद चेचेव नाम अपनाने से पहले कई धार्मिक परंपराओं से होकर यात्रा की थी। उनका जन्म एक कैथोलिक त्सोत्सिल समुदाय में हुआ। लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में वे इंजील ईसाई बने। दूसरे प्रोटेस्टेंट परिवारों के साथ उनके परिवार को सान हुआन चामुला से निकाल दिया गया, जिसके बाद वे सान क्रिस्तोबल दे लास कासास के पास आ बसे और आगे चलकर एडवेंटिस्ट परंपरा से भी जुड़े।
1990 के दशक में स्पेन से आए मुसलमानों के माध्यम से इस क्षेत्र में इस्लाम पहुँचा। उपलब्ध रिपोर्टें उनके कलिमा पढ़ने की ठीक तारीख या स्थान नहीं बतातीं, लेकिन दोनों मैदानी स्रोत 1995 को उनके इस्लाम स्वीकार करने का वर्ष बताते हैं। मैनुएल ने मोहम्मद नाम लिया। एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी धारणा को सरल शब्दों में रखा: वे मुसलमान थे, सत्य को पहचानने का विश्वास रखते थे, दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे और रमज़ान के रोज़े रखते थे।
इबादत सीखना आसान नहीं था। उनकी पहली भाषा त्सोत्सिल थी और वे स्पेनी पढ़-लिख नहीं सकते थे। फिर भी उन्होंने सुनकर कुछ महीनों में नमाज़ और आवश्यक क़ुरआनी अंश सीख लिए। उन्होंने इसे अल्लाह की दया से जोड़ा और याद किया कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ भी पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। इस प्रकार इस्लाम उनके लिए दूर का विचार नहीं, रोज़मर्रा की साधना बन गया।
1998 में उन्होंने मक्का की हज यात्रा की। वहाँ अलग-अलग रंग और पृष्ठभूमि के मुसलमानों को एक ही वेश में साथ खड़ा देखकर उन्होंने महसूस किया कि उन भेदों का महत्व मिट गया था। यह अनुभव इस्लाम स्वीकार करने के बाद आया और उसने पहले से चुने हुए उनके मार्ग में बराबरी और भाईचारे का अर्थ गहरा किया।
मुसलमान बनने का अर्थ उनके लिए त्सोत्सिल संस्कृति छोड़ना नहीं था। एक स्वतंत्र रिपोर्ट में उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे अपने पूर्वजों की संस्कृति त्यागने वाले नहीं हैं। उन्होंने उन लोगों की हर बात भी नहीं मानी जिन्होंने स्थानीय स्तर पर इस्लाम से परिचय कराया था। 2009 में धन जुटाने और मूलनिवासी मुसलमानों की तस्वीरों के उपयोग पर असहमति के कारण वे कुछ परिवारों के साथ एक स्थानीय नेतृत्व से अलग हो गए। आस्था बनी रही, और स्वतंत्र विवेक भी।
उनकी यात्रा कई धार्मिक परंपराओं से होकर इस्लाम पर ठहरी—ऐसे सत्य के रूप में जिसे नमाज़, सीखने, रोज़े और समानता के साथ जिया जाता है। यह कहानी यह भी दिखाती है कि नए मुसलमान की शिक्षा हमेशा उसकी भाषा की किताब से शुरू नहीं होती; कभी वह विश्वसनीय आवाज़, धैर्य और उसकी भाषा व संस्कृति का सम्मान करने वाले समुदाय से शुरू होती है।
