डोमिनिक लिवाया: गलती खोजने निकले, पढ़ने ने सवाल बदल दिया

डोमिनिक लिवाया क्रोएशिया के ओसियेक में कैथोलिक परिवेश में बड़े हुए। उन्होंने याद किया कि बचपन में उन्हें चर्च जाना पसंद था और वे वेदी-सेवक भी रहे। स्कूल के वर्षों में वे नास्तिकता के दौर से गुज़रे, लेकिन उनके अनुसार उस दृष्टि का खालीपन वह अर्थ नहीं दे सका जिसकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे।
उन्होंने क़ुरआन को सही सिद्ध करने की इच्छा से पढ़ना शुरू नहीं किया। उनके लंबे साक्षात्कार का शीर्षक आरंभ-बिंदु साफ़ बताता है: वे क़ुरआन में गलतियाँ खोज रहे थे। इस अर्थ में पढ़ना किसी पहले से तय परिणाम की रस्म नहीं, बल्कि एक आपत्ति की परीक्षा था।
लेकिन जाँच ने उनकी अपेक्षा उलट दी। लिवाया उसी वाक्य में अनुभव का सार देते हैं: वे गलती खोजते रहे और अंत में मुसलमान हो गए। उपलब्ध लिखित सामग्री उन बहसों या विस्तृत दलीलों को जोड़ने की अनुमति नहीं देती जो सुरक्षित नहीं हैं; इतना स्पष्ट है कि क़ुरआन की जाँच उनके बताए निर्णायक कारक थी।
मूल साक्षात्कार का विवरण निर्णय को 2013 में तुर्किये में रखता है, पर दिन, शहर या शहादा का दृश्य नहीं देता। रमज़ान 2025 की एक क्षेत्रीय रिपोर्ट ने इसे उनका तेरहवाँ रमज़ान कहा, जो मोटे तौर पर इसी अवधि से मेल खाता है, यद्यपि उसने ‘तेरह वर्ष पहले’ जैसी अनुमानित भाषा भी इस्तेमाल की। इसलिए मूल प्रकाशक की स्पष्ट 2013 तिथि रखी गई है, बिना झूठी सटीकता के।
प्रकाशक के अनुसार, उनके निर्णय को आसपास के लोगों ने आसानी से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लगातार बहस के बजाय अपने आचरण से गलतफहमी का उत्तर देने की कोशिश की। बाद के सार्वजनिक परिचय उन्हें व्यापार, खेल और प्रशिक्षण में सक्रिय दिखाते हैं, लेकिन इन बाहरी बातों को उनके भीतर के अनुभव का प्रमाण नहीं बनाया गया है।
उनकी कहानी धार्मिक खोज का एक सीमित लेकिन उपयोगी पाठ देती है: कोई व्यक्ति आपत्ति लेकर किसी ग्रंथ में प्रवेश कर सकता है, पर गंभीर खोज पढ़ाई को आरंभिक धारणा सुधारने की अनुमति भी देती है। यह एक व्यक्ति का अनुभव है, संवाद का विकल्प या क़ुरआन और आस्था के हर प्रश्न का विशेषज्ञ-स्वीकृत उत्तर नहीं।
