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जॉन फ़ॉन्टेन: सेनेगल की मेहमाननवाज़ी से नमाज़ सीखने तक

गर्म रोशनी में कालीन पर रखा बंद कुरआन
चित्र: Qur’an still life — Malik Shibly / Unsplash (Unsplash लाइसेंस).

जॉन फ़ॉन्टेन मैनचेस्टर के एक ईसाई परिवेश में बड़े हुए। संगीत बचपन से उनके जीवन का हिस्सा था, लेकिन ईसा और ईश्वर के बारे में एक प्रश्न भी उनके साथ बना रहा। उनके अनुसार, चर्च में बच्चों को पढ़ाने वाले एक व्यक्ति ने उनके लिखे शब्द बदल दिए थे। इससे उन्होंने ईसा की ईश्वरता पर प्रश्न किया। उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह नहीं था; वे उस विश्वास की तलाश में थे जिसे सच्चे मन से स्वीकार कर सकें।

आगे चलकर वे जैज़ गायक बने, फिर हीरों का अध्ययन और अफ़्रीका में व्यापार करने लगे। सेनेगल में उन्हें मुसलमानों का जीवन निकट से देखने का अवसर मिला। इससे पहले समाचारों ने उनके मन में डरावनी छवि बनाई थी। एक होटल कर्मचारी ने उन्हें अपने घर ठहराया। परिवार के साथ भोजन करना, उन्हें नमाज़ पढ़ते देखना और पारिवारिक अवसरों में शामिल होना, अपरिचित धर्म को परिचित चेहरों से जोड़ने लगा। वे अज़ान का अर्थ जानना चाहते थे।

केवल अच्छा व्यवहार उनके निर्णय के लिए पर्याप्त नहीं था। वे बताते हैं कि उन्होंने इस्लाम पर आपत्तियाँ उठाईं, लेकिन जाँच बढ़ने के साथ उसकी शिक्षाओं और कुरआन में रुचि भी बढ़ी। मेज़बान की यह इच्छा कि वे इस्लाम को समझें, उन्हें प्रभावित करती थी। उन्हें इसमें केवल सामाजिक परंपरा नहीं, गंभीर विश्वास दिखाई दिया। फिर भी इन मुलाक़ातों और उनके अंतिम निर्णय के बीच कई वर्ष बीते।

एक और बाधा थी जिसका आसपास के मुसलमानों को शायद ध्यान नहीं था। वे समझते थे कि मुसलमान केवल जन्म से हुआ जा सकता है। ब्रिटेन और अमेरिका के नए मुसलमानों की कहानियों ने यह धारणा बदली। अपना निर्णय घोषित करने का तरीका समझने से पहले ही उन्होंने रमज़ान के रोज़े रखे और नमाज़ की कोशिश की। पुराने जीवन की कुछ आदतें छोड़ने की हिचक भी कदम को टालती रही।

सन् 2008 में मिस्र में उन्होंने मित्रों से नमाज़ सिखाने को कहा। तब उन्हें शहादा और उसका अर्थ मालूम हुआ और उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया। उनकी स्मृति में विश्वास घोषणा से पहले आकार ले चुका था; घोषणा ने उसे स्पष्ट शुरुआत दी। वे उस समय बोझ उतरने जैसा अनुभव बताते हैं, लेकिन इसे सीखने या कठिनाइयों का अंत नहीं मानते।

ब्रिटेन लौटकर उन्हें व्यावहारिक सहारे की आवश्यकता थी। एक मस्जिद में एक मुसलमान ने फ़ातिहा, छोटी सूरतें और नमाज़ सिखाई। दूसरे लोग भी उनके साथ बैठते और सीखने में मदद करते थे। रोज़ की नमाज़ों को उनके समय पर निभाना शुरुआती चुनौती थी। कुछ रिश्तेदार और मित्र उनके निर्णय से चिंतित थे; बाद में उन्होंने बताया कि समय के साथ संबंध संभल गए।

इसके बाद उन्होंने जैज़ गायन का काम छोड़ा और लेखन तथा इस्लाम के परिचय की ओर बढ़े। सन् 2017 में मलांग की एक सभा में उन्होंने ज्ञान के साथ धर्म समझने पर ज़ोर दिया। उनकी यात्रा स्वागत और मार्गदर्शन, दोनों की आवश्यकता दिखाती है: कोई अपने अच्छे व्यवहार से परिचय का द्वार खोलता है और कोई शुरुआती कदम समझाता है, ताकि मुसलमानों के बीच रहने वाला नया व्यक्ति भी यह न सोचता रहे कि शुरुआत कैसे करे।

स्रोत

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