पीटर गूल्ड: स्कूल के रास्ते उठा एक सवाल

पीटर गूल्ड बचपन से डिज़ाइन, कंप्यूटर और कला के क्षेत्र में काम करना चाहते थे। धर्म में उनकी ऐसी रुचि नहीं थी। स्कूल के अंतिम वर्ष में बस के सफ़र में परिचित हुई एक मुस्लिम छात्रा ने उन्हें अपनी धारणा पर दोबारा सोचने का कारण दिया। वह समझदार थी और ईश्वर में विश्वास रखती थी। यह बात उन्हें प्रश्न पूछने और उस विषय को गंभीरता से देखने की ओर ले गई जिसे उन्होंने पहले ठीक से समझा ही नहीं था।
बातचीत के साथ पढ़ना, व्याख्यान सुनना और स्वयं शोध करना जुड़ गया। क़ुरआन और इस्लाम के सिद्धांतों ने उन्हें आगे जानने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2007 में प्रकाशित बातचीत में उन्होंने बताया कि कई महीनों तक परिवार से अपनी रुचि छिपाए रखी और क़ुरआन को गिटार की पत्रिकाओं के बीच रखते थे। उनकी समझ बढ़ रही थी, लेकिन घर में इस बदलाव को बताने के लिए वे अभी तैयार नहीं थे।
उन्होंने रोज़ा और नमाज़ भी आज़माए। शुरुआती प्रश्नों के कई वर्ष बाद, 2002 के रमज़ान में उन्होंने शहादा पढ़कर इस्लाम स्वीकार किया। बाद में उन्होंने बताया कि मन का सुकून उन्हें आकर्षित करने वाली बातों में था और उस रात नमाज़ ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। निर्णय के पीछे लंबे समय की खोज थी; उनकी पूरी यात्रा किसी एक मुलाक़ात में सिमटती नहीं है।
माता-पिता को पहले झटका लगा। फिर भी उन्होंने बाद की बातचीत में नियमित मुलाक़ातों, फ़ोन पर बात करने और अच्छे संबंध का वर्णन किया। परिवार को समझने के लिए समय चाहिए था कि बेटे का नया विश्वास उसके जीवन और उनसे रिश्ते को कैसे प्रभावित करेगा। उसके निर्णय को स्वीकार करना, उसके विश्वास को अपना लेना नहीं था। स्नेह बना रहा और प्रश्न भी धीरे-धीरे समझे जाने थे।
विश्वास का असर काम पर भी पड़ा। उन्होंने स्कूल के एक पुराने मित्र के साथ वेबसाइट बनाने का व्यवसाय शुरू किया था। कुछ प्रस्तावित परियोजनाएँ उनकी धार्मिक मान्यताओं से टकराती थीं। ऑनलाइन शराब बेचने की वेबसाइट को उन्होंने उस साझेदारी से अलग होने के कारणों में गिनाया। नया व्यवसाय शुरू करते समय उनके लिए यह भी मायने रखने लगा कि कोई परियोजना किस उद्देश्य की सेवा करती है।
गूल्ड ने डिज़ाइन और डिजिटल परियोजनाओं में काम जारी रखा तथा मुस्लिम रचनाकारों और उद्यमियों को अपनी प्रतिभा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया। कंप्यूटर और कला के पुराने शौक़ बने रहे; अब उनके साथ उद्देश्य का प्रश्न भी था। स्कूल के रास्ते शुरू हुई खोज पढ़ाई, परिवार और काम तक पहुँची। शहादा के बाद भी रोज़मर्रा के जीवन में विश्वास को उतारने की सीख चलती रही।
