नईमा बी. रॉबर्ट: काहिरा के एक प्रश्न से लंदन में शहादा तक

नईमा बी. रॉबर्ट का जन्म लीड्स में हुआ और उनका पालन-पोषण जिम्बाब्वे के एक गैर-धार्मिक परिवार में हुआ। लंदन विश्वविद्यालय पहुँचते समय उनके भीतर अफ्रीकी पहचान और राजनीतिक चेतना प्रबल थी, पढ़ाई और काम को लेकर स्पष्ट योजनाएँ थीं, जबकि रोजमर्रा के जीवन में धर्म का स्थान बहुत कम था। 1998 की गर्मियों में वह एक संगीत समारोह में शौकिया कलाकार के रूप में मिस्र गईं; इसी यात्रा ने उनके भीतर के प्रश्नों को नए क्रम में रख दिया।
हिजाब को देखकर उनकी पहली प्रतिक्रिया नकारात्मक थी; उन्होंने उसे महिलाओं पर अत्याचार का प्रतीक समझा। समारोह के एक आयोजक की पत्नी से छोटी-सी बातचीत ने उन्हें रुककर सोचने पर मजबूर किया। उस महिला ने समझाया कि वह चाहती है लोग उसके रूप के बजाय उसके कथन और कर्म से उसे परखें। यह कोई पूरा धार्मिक तर्क नहीं था, पर इसने नईमा को अपने रूप और आकर्षण पर निर्भरता की जाँच करने तथा आसपास दिखाई देने वाली नमाज़ और अल्लाह की याद पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।
लंदन लौटकर उन्होंने अधिक शालीन वस्त्र आजमाए और मार्माड्यूक पिकथॉल का अंग्रेज़ी कुरआन अनुवाद खरीदा। पहली पढ़ाई में सब कुछ स्पष्ट नहीं हुआ; उनकी प्रति प्रश्नों और निशानों से भर गई, फिर उन्होंने कुरआन की उत्पत्ति, नमाज़ और इस्लामी नियमों को समझना शुरू किया। पाँच दैनिक नमाज़ों की लय, नशीली चीज़ों से दूरी और स्त्री-पुरुष संबंधों की मर्यादा में उन्हें अर्थ दिखा। फिर भी वह स्वयं को मुस्लिम नहीं कहती थीं और कुछ अभ्यास अपनाने को तुरंत घोषणा कर देने के समान नहीं मानती थीं।
विश्वविद्यालय की एक ऐसी छात्रा से मित्रता, जिसने हाल ही में इस्लाम स्वीकार किया था, ने उनकी बौद्धिक एकाकीपन को तोड़ा। फिर भी पहचान का प्रश्न बाकी था: एक अश्वेत अफ्रीकी महिला उस धर्म में कैसे प्रवेश करे जिसे वह अरब या एशियाई धर्म समझती रही थी? नस्लीय रूप में इस्लाम तलाशते हुए वह “नेशन ऑफ इस्लाम” की बैठकों में गईं, पर बाद में उस राह को अस्वीकार किया, क्योंकि नस्ल को केंद्र बनाने और सभी मनुष्यों के अपने सृष्टिकर्ता से संबंध को केंद्र बनाने वाले इस्लाम में अंतर स्पष्ट हो गया।
क्रिसमस की छुट्टी निकट आई तो उन्होंने अफ्रीकी मुस्लिम समाज में पहचान के प्रश्न को परखने के लिए गिनी जाने का निर्णय किया। रास्ते में और कोनाक्री में उन्होंने ऐसे अफ्रीकी मुसलमान देखे जो अपनी भाषा, पोशाक और अपनापन बनाए हुए थे; इससे यह धारणा टूटने लगी कि इस्लाम के लिए अफ्रीका को छोड़ना पड़ता है। उन्होंने वुज़ू और नमाज़ सीखी, रमज़ान के रोज़े रखे और इबादत की दैनिक लय में रहीं। फिर भी उनकी आत्मकथा साफ करती है कि उस समय तक उन्होंने शहादा नहीं पढ़ा था।
लंदन लौटने के कुछ सप्ताह बाद वह अपनी मित्र के साथ रीजेंट्स पार्क की सेंट्रल मस्जिद गईं और 1998 में शहादा पढ़ा। OnePath के उनके साक्षात्कार के साथ प्रकाशित परिचय उनके इस्लाम स्वीकार करने का वर्ष 1998 बताता है। [OnePath] यह निर्णय कई महीनों के प्रश्न, अध्ययन और अभ्यास के बाद आया; वह केवल काहिरा की पहली घटना का परिणाम नहीं था।
नईमा ने 2005 में प्रकाशित आत्मकथा में यह यात्रा अपनी आवाज़ में लिखी। 2010 के एक साक्षात्कार में उन्होंने इसे विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष में रखा और शिक्षण व लेखन को अपने बाद के सार्वजनिक जीवन का भाग बताया। ये ऐतिहासिक अभिलेख हैं, आज की निजी धार्मिक अवस्था का अनुमान लगाने का आधार नहीं। उनकी कहानी दिखाती है कि गरिमा का प्रश्न अनुशासित अध्ययन तक ले जा सकता है और अफ्रीकी पहचान उस आस्था में सुरक्षित रह सकती है जो किसी जाति का नाम नहीं है।
