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याह्या रोडस: जब एक ईश्वर की तलाश ज्ञान की राह बन गई

गर्म रोशनी में कालीन पर रखी बंद क़ुरआन
Malik Shibly / Unsplash — source · license.

नाम जानने से पहले की तलाश

याह्या रोडस की यात्रा किसी व्यवस्थित धार्मिक प्रश्न से शुरू नहीं हुई। पहले उन्हें धीरे-धीरे यह महसूस हुआ कि आधुनिक जीवन में कुछ बुनियादी कमी है। सामाजिक वास्तविकताओं पर ध्यान, अमेरिका के बाहर लोगों के संघर्षों की जानकारी और अलग संस्कृतियों के प्रति खुलापन उनके दृष्टिकोण को विस्तृत करता गया। बाद में उन्होंने कहा कि वे खोज रहे थे, जबकि उन्हें स्वयं यह मालूम नहीं था कि वे खोज में हैं।

उनका पालन-पोषण ईसाई वातावरण में हुआ, लेकिन मूल पाप और त्रित्व को जिस रूप में वे समझते थे, उसे स्वीकार नहीं कर सके। वे एक ईश्वर में विश्वास रखते थे और ईसा अलैहिस्सलाम को नबी मानते थे। इस्लाम के बारे में वे बहुत कम जानते थे; इसलिए उनकी पुरानी स्थिति किसी विकसित शत्रुता से अधिक प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रतीक्षा करती हुई एक खाली जगह थी।

जब प्रश्न तौहीद से मिले

वे एक मस्जिद में गए, ख़ुतबा सुना, मुस्लिम समुदाय से मिले और कुछ छोटे परिचय-पत्र पढ़े। ये साधारण मुलाकातें उनके भीतर पहले से बन रहे प्रश्नों से जुड़ गईं। उन्होंने कहा कि जिसकी वे अनजाने में तलाश कर रहे थे, वह इस्लाम में एक साथ स्पष्ट हुआ और औपचारिक शहादा से पहले ही उन्हें इसकी सच्चाई समझ में आ गई।

उनका एक निकट मित्र उनसे एक सप्ताह पहले मुस्लिम हुआ था। अपने निर्णय की तैयारी में रोडस ने उन चीज़ों को छोड़ना चाहा जिन्हें वे नई जिंदगी के योग्य नहीं मानते थे। शहादा से एक दिन पहले उन्होंने दूसरे मित्र को बताया कि पुराने तौर-तरीके अब जारी नहीं रह सकते। मित्र ने एक सपना सुनाया; इसे केवल उनकी व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में रखा गया है, इस्लाम के प्रमाण के रूप में नहीं।

एक शुक्रवार का निर्णय

2014 में प्रकाशित एक सार्वजनिक भाषण के प्रतिलेख में रोडस ने कहा कि उन्होंने 13 सितंबर 1996 को MCA मस्जिद में इस्लाम स्वीकार किया और मुस्तफ़ा शहीद वहाँ उपस्थित थे। 2017 का मूल साक्षात्कार स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है कि शहादा शुक्रवार को हुआ और फोन एक दिन पहले किया गया था; लेकिन वह तारीख या शहादा के शब्द दोहराता नहीं। इसलिए अनुपलब्ध रस्म या संवाद गढ़े नहीं गए हैं।

शहादा के बाद उन्होंने सांसारिक चिंता का भारी बोझ उतरने जैसी अनुभूति का वर्णन किया। यह उस क्षण का उनका अपना बयान है। उसी सभा में उनकी मुलाकात मॉरिटानिया से आए एक शिक्षक से हुई और उन्हें वहाँ आने का निमंत्रण मिला। निर्णय कहानी का अंत नहीं था; उसने नया प्रश्न खोला—अब चुने हुए धर्म को सीखें कैसे?

नई शुरुआत से ज्ञान की राह तक

कुछ ही महीनों में वे अध्ययन मंडली से जुड़ गए। आस्था, इबादत और आध्यात्मिक प्रशिक्षण को साथ रखने वाले एक ग्रंथ ने उनमें सीखने का ऐसा प्रेम जगाया जो साधारण शिक्षा में महसूस नहीं हुआ था। माँ ने विश्वविद्यालय न छोड़ने को कहा था, फिर भी ज्ञान की चाह बढ़ती गई। 1997 की गर्मियों में, इस्लाम स्वीकारने के एक वर्ष के भीतर, वे मॉरिटानिया गए; बाद में सीरिया में अरबी मजबूत की और फिर अध्ययन जारी रखने लौटे।

उन्होंने बाद में अलग शैक्षिक वातावरणों में वर्षों बिताने के बाद पश्चिम लौटने की कठिनाई और ऐसी संस्थाओं की जरूरत पर बात की जो लोगों को अपने समाज में धर्म सीखने और जीने में मदद करें। यह कहानी किसी इंसानी मिसाल को अपने आप में प्रमाण नहीं बनाती; यह दिखाती है कि स्रोत से इस्लाम को जानना और एक ईश्वर की स्पष्टता कैसे लंबे ज्ञान, जिम्मेदारी और कर्म की राह बन सकती है।

स्रोत

  1. SeekersGuidance — Learn to Live interview (2017)
  2. Direct public talk transcript — Virtues Tour (2014)
  3. SeekersGuidance — Muhammad’s Message (2016)
  4. Al-Maqasid — faculty biography
  5. Al-Madina — teacher biography

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