सादिक़ा इस्मत: इबादत की तलाश से इस्लाम चुनने तक

ईसाई परंपराओं के भीतर एक लंबी यात्रा
इस वृत्तांत की लेखिका अपना नाम सादिक़ा इस्मत बताती हैं; उनके ईसाई परिवार में उन्हें स्टेफ़नी कहा जाता था। वे लिखती हैं कि वे दक्षिण अफ़्रीका के केप टाउन में रहती थीं। प्रोटेस्टेंट परिवार में पली-बढ़ीं सादिक़ा ने कई वर्षों तक अलग-अलग ईसाई परंपराओं को समझने की कोशिश की और 2008 में कैथोलिक मत अपनाया।
अनुशासन, उपासना और समर्पित जीवन उन्हें आकर्षित करते थे। इसी कारण उन्होंने नन बनने पर विचार किया और अलग-अलग धार्मिक समुदायों में गईं। जनवरी 2011 में वे आख़िरी कॉन्वेंट से बाहर आ गईं और वह रास्ता समाप्त हो गया, लेकिन ऐसे धर्म की उनकी खोज समाप्त नहीं हुई जिसे वे ईमानदारी से जी सकें।
इस्लामी इबादत में जिसने उन्हें आकर्षित किया
उनके अनुसार इस्लाम की कुछ बातें वर्षों से उनका ध्यान खींचती थीं: शालीन पहनावा, सिर ढकना, रोज़ा, नियमित नमाज़, सज्दा और वुज़ू। ये उनके लिए केवल बाहरी रूप नहीं थे; इनमें उन्हें ऐसी इबादत दिखाई दी जिसमें शरीर और पूरे दिन का जीवन अल्लाह के साथ स्पष्ट संबंध में आ जाता है।
कॉन्वेंट छोड़ने के बाद वे फिर पढ़ने और प्रश्न पूछने लगीं। उन्होंने क़ुरआन का अंग्रेज़ी अनुवाद और इस्लाम अपनाने वाली महिलाओं के वृत्तांत पढ़े, तथा नमाज़ और वुज़ू का अभ्यास शुरू किया। वे बताती हैं कि इबादत की सरलता और मुसलमानों के बीच दिखाई देने वाली एकता ने उन्हें आकर्षित किया; इस्लाम चुनने के निर्णय से पहले क़ुरआन के बारे में एक लेख पढ़ना एक निर्णायक कदम बना।
दिन तक दर्ज एक निर्णय
जब उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चय कर लिया, तो मुस्लिम परिचितों से ऐसी मुलाक़ात तय कराई जिसमें वे शहादा कह सकें। उनके वृत्तांत के अनुसार मुलाक़ात शाम को एक स्थानीय शॉपिंग सेंटर के पास खड़ी कार में हुई। वहाँ एक पुरुष, उनकी पत्नी और उनका छोटा बेटा मौजूद थे; उन्होंने कुछ बातें समझाईं और उन्हें पुस्तकें उधार दीं।
सादिक़ा इस निर्णय की तारीख़ स्पष्ट रूप से 22 फ़रवरी 2011 लिखती हैं। उनके बताए क्रम में उस क्षण ने इबादत, अध्ययन और प्रश्नों से गुज़रती खोज को पूरा किया और सीखने तथा अभ्यास का नया चरण शुरू किया।
सीखने की वह राह जिसे साथ की ज़रूरत थी
इसके बाद उन्होंने एक मदरसे में पढ़ना शुरू किया, मस्जिद गईं और नमाज़ तथा रोज़मर्रा के अभ्यास एक-एक कदम करके सीखे। वे बताती हैं कि आरंभ में नई बातों की अधिकता कठिन लगी, और इमाम तथा आसपास के लोगों की सलाह सुनने से उन्हें सीखते रहने में सहायता मिली।
2011 में प्रकाशित उनका वृत्तांत इस यात्रा को व्यवस्थित इबादत और अपनत्व की लंबी खोज से इस्लाम चुनने, फिर उसके दैनिक अभ्यास को धीरे-धीरे सीखने की ओर बढ़ते हुए दिखाता है। कथा उसी वर्ष के निर्णय के बाद सीखने की शुरुआत पर समाप्त होती है।
