आयाना मून: जब अपनी भाषा में उत्तर बहुत कम थे

कोई व्यक्ति उस धर्म को कैसे समझे जिसके बारे में उसकी अपनी भाषा में भरोसेमंद सामग्री बहुत कम हो? और यदि पहली छवि युद्ध, आतंक और भय से बनी हो, तो वह समाचारों की छवि और धर्म के अपने दावों में अंतर कैसे करे? [1]
आयाना जिह्ये मून अपनी जिज्ञासा की शुरुआत सात वर्ष की उम्र से बताती हैं। इस्लाम से उनका पहला परिचय किसी शांत आरंभिक पुस्तक के माध्यम से नहीं हुआ। परिवार में 11 सितंबर, इराक और अफ़ग़ानिस्तान के युद्धों पर बातचीत होती थी, और इस्लाम का नाम संघर्ष के साथ सुनाई देता था। लेकिन उसी समय उन्हें यह भी पता चला कि मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते हैं। एक छोटा-सा प्रश्न रह गया: लोग बार-बार अपना काम रोककर नमाज़ क्यों पढ़ते हैं, और उसमें क्या खोजते हैं? [1]
कोरियाई भाषा में स्पष्ट सामग्री कम थी और आयाना की अंग्रेज़ी भी कमजोर थी। वे अंग्रेज़ी शब्दकोश के साथ Google पर खोजती थीं। बाद में उन्होंने पुस्तकें पढ़ीं, व्याख्यान सुने और शिक्षकों से प्रश्न किए। [1]
उनकी पुस्तक से उद्धृत विवरण के अनुसार, माध्यमिक विद्यालय में उन्हें एक कोरियाई प्रोफ़ेसर की किताबें मिलीं जो इस्लाम और मध्य पूर्व का अध्ययन करते थे। उन्होंने किताबें पढ़ीं और उन कार्यक्रमों में गईं जहाँ प्रोफ़ेसर बोलते थे, लेकिन वयस्कों की चर्चा में शामिल होने के लिए स्वयं को बहुत छोटा समझती थीं। उच्च विद्यालय में उन्होंने आखिर उनसे मिलकर अपना परिचय दिया। इस्लाम अब दूर के युद्धों से जुड़ा शब्द नहीं था; वह वर्षों से पढ़ा जा रहा विषय बन चुका था। [1]
आयाना ने बाद में कहा कि लंबे अध्ययन के कारण निर्णय लेना भीतर से उतना कठिन नहीं था। उनके शब्दों में, वे इस्लाम की मूल धारणा को समझ चुकी थीं। [1]
वे अपने इस्लाम स्वीकार करने की तारीख 29 अप्रैल 2012 बताती हैं; उस समय उनकी आयु सोलह वर्ष थी। [2][3][4]
2022 की एक बातचीत में उन्होंने बताया कि पहले रमज़ान में उन्होंने रोज़ा धीरे-धीरे सीखते हुए रखा। मलेशिया पहुँचने के बाद ही उन्हें तरावीह की नमाज़ के बारे में पता चला। इस तरह इस्लाम स्वीकार करने के साथ उनका सीखना समाप्त नहीं हुआ; हर नए परिवेश ने इबादत और अभ्यास का एक नया पक्ष उनके सामने खोला। [2]
निर्णय के बाद सामाजिक कठिनाइयाँ आईं। आयाना ने कहा कि माता-पिता सहमत नहीं थे और मित्रों को लगा कि वह उज्ज्वल भविष्य को जोखिम में डाल रही हैं। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मित्र चिंता प्रेम के कारण कर रहे थे और वे मित्र बने रहे। बाद में जब उन्होंने मुस्लिम-बहुल देश में आगे अध्ययन का निश्चय किया, तो उनके अनुसार आर्थिक सहायता रुक गई। मलेशिया जाने के लिए उन्होंने रेस्तराँ, ट्यूशन और अन्य अंशकालिक काम किए। [1][3]
कठिनाई केवल जानकारी पाने की नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की इबादत की भी थी। 2021 के एक वेबिनार में उन्होंने कोरिया में नमाज़ का सामान ढूँढ़ने और यात्रा के दौरान नमाज़ के लिए जगह पाने की परेशानी का उल्लेख किया। ईमेल साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक सहायता के बिना बिताए समय ने बाद में उन्हें अपनी पुस्तक की बिक्री का एक हिस्सा दान करने के लिए प्रेरित किया। [4][1]
आयाना ने लिखा कि इस्लाम ने उन्हें अपने भीतर अधिक शांति दी और उनका निश्चय मजबूत किया। [1]
उनकी यात्रा बताती है कि अपनी भाषा में उपयोगी पुस्तकें और प्रश्न सुनने वाले शिक्षक सीखने में कितना सहारा देते हैं। [1]
आयाना की यात्रा का आरंभ एक सरल प्रश्न से हुआ था: मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ क्यों पढ़ते हैं? उसी प्रश्न से शब्दकोश, पुस्तकों और व्याख्यानों का लंबा रास्ता बना; 29 अप्रैल 2012 के बाद भी यह सीख इबादत और दैनिक जीवन की बारीकियों तक फैलती रही। [1][2]
स्रोत
- Wolipop/Detik ईमेल साक्षात्कार, 24 मई 2020
- World Muslim Communities Council सार, 28 अप्रैल 2022
- Republika पुस्तक-आधारित प्रोफ़ाइल, 12 अप्रैल 2020
- 21 नवंबर 2021 के वेबिनार पर NU Online की रिपोर्ट, प्रकाशित 22 नवंबर 2021
