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अहमद नाओकी माएनो: जब सवाल को सांस लेने की जगह मिली

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ईश्वर को खोजता हुआ मनुष्य क्या चाहता है—ऐसा उत्तर जो उसे घेर ले, या ऐसा खुला दरवाज़ा जिसके पार जाने का निर्णय वह स्वयं कर सके?

जापान में माध्यमिक विद्यालय के दिनों से ही नाओकी माएनो धर्म को गंभीरता से देखते थे। SBS जापानी के अनुसार, एक समय वे बौद्ध मार्ग अपनाने पर विचार कर रहे थे। [1]

हाई स्कूल के दौरान माएनो पढ़ाई के लिए मेलबर्न गए और एक मिस्री मुस्लिम परिवार से मिले। बाद में उन्होंने पिता और पुत्र के दो अलग तरीकों का वर्णन किया। पुत्र क़ुरआन से वैज्ञानिक तर्क देकर उन्हें मनाना चाहता था, जो उन्हें खटकता था; पिता ने अंग्रेज़ी अनुवाद दिया और स्वयं पढ़ने तथा सोचने को कहा। [2]

पिता ने उनकी सोचने की क्षमता का जो सम्मान किया, माएनो ने उसे महत्व दिया। जापान लौटने के बाद वे स्वयं इस्लाम का अध्ययन करने लगे। जिस धर्म को वे पहले दूर से खारिज करते थे, उस परिवार के सद्व्यवहार ने उन्हें उसे जानने का अवसर दिया; निर्णय फिर भी उनका अपना था। [2]

उन्होंने 1994 में, लगभग अठारह वर्ष की आयु में, इस्लाम स्वीकार किया। [3]

जापान में उनका अध्ययन जारी रहा। OnePath द्वारा 2025 में प्रकाशित उनके विवरण के अनुसार, संकोच के समय फ़िल्म Malcolm X, विशेषकर उसके हज वाले दृश्य ने उन्हें साहस दिया। उसी रात उन्होंने पहली बार सज्दा किया और उसे अपने इस्लाम की शुरुआत माना। लगभग एक महीने बाद नागोया के इस्लामिक एसोसिएशन में उन्होंने औपचारिक रूप से शहादा पढ़ी। [4]

उनकी यात्रा निजी चुनाव पर समाप्त नहीं हुई। उन्होंने अरबी और इस्लामी विद्याओं का अध्ययन किया और जापान में स्वैच्छिक इमाम, शोधकर्ता तथा शिक्षक बने। 2026 में SBS ने उन्हें मुस्लिम समुदाय का सहारा देने वाला व्यक्ति बताया और मुसलमानों तथा गैर-मुसलमानों के बीच पुल बनने की उनकी आकांक्षा पर चर्चा की। [1] [5]

एक प्रश्न पढ़ने तक पहुँचा; पढ़ना अध्ययन बना; और अध्ययन वर्षों की सेवा में बदल गया। जिस युवक को बिना दबाव समझने का अवसर मिला था, वही आगे चलकर दूसरों के लिए समझ की जगह बनाने लगा। [1] [2] [5]

स्रोत

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