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नाथन एलिंग्टन: विश्वास अपना होना चाहिए

गर्म रोशनी में कालीन पर रखा बंद कुरआन
चित्र: Qur’an still life — Malik Shibly / Unsplash (Unsplash लाइसेंस).

नाथन एलिंग्टन का जीवन फुटबॉल के इर्द-गिर्द था। वे ईसाई परिवेश में पले थे, लेकिन धार्मिक अभ्यास में अधिक सक्रिय नहीं थे। उनके भाई पहले मुस्लिम बने, फिर भी उन्होंने तुरंत गंभीर खोज शुरू नहीं की। बाद में अपनी भावी पत्नी से धर्म पर हुई बातचीत ने प्रश्नों को निजी बना दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वास बदलने के लिए उन्हें स्वयं आश्वस्त होना होगा।

उन्होंने क़ुरआन और इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं को पढ़ना शुरू किया। 2021 की बातचीत में उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे क़ुरआन के ईश्वरीय होने पर उनका विश्वास बना। फिर इस्लामी मान्यताओं की एक सूची में उन्हें वे बातें मिलीं जिन्हें वे स्वीकार करने लगे थे। विगन के लिए खेलते समय, लगभग 2004–2005 में, उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया।

दिशा चुन लेना, हर कदम जान लेना नहीं था। उन्होंने शुरुआती अज्ञान और नमाज़ सीखने में हुई देरी के बारे में खुलकर बताया। एक रिश्तेदार उन्हें एक मुस्लिम व्यक्ति के पास ले गए, जो क़ुरआन के संदर्भ से समझाते थे। बार-बार मिलने और सीखने से विश्वास को व्यवहार में लाने का रास्ता मिला।

फुटबॉल में भी अपनी ज़रूरतें समझानी पड़ीं। उन्होंने एक कोच को नमाज़ के बारे में बताया और अभ्यास के साथ उसका समय व्यवस्थित किया। बाद की बातचीत में उन्होंने कुछ साथी खिलाड़ियों की गलतफ़हमियों और आहत करने वाली बातों का भी उल्लेख किया। दूसरी ओर, मुस्लिम खिलाड़ियों ने साथ दिया और उन्हें मस्जिद ले गए।

उन्होंने आगे चलकर मुस्लिम फुटबॉल खिलाड़ियों का संगठन स्थापित किया, ताकि क्लब और खिलाड़ी एक-दूसरे की ज़रूरतें समझ सकें। हलाल भोजन, नमाज़ का समय और पास की मस्जिद जैसी बातें स्पष्ट संवाद से आसान हो सकती थीं। 2017 के साक्षात्कार में उन्होंने इस काम को अनजान होने से पैदा हुई दूरियाँ कम करने से जोड़ा।

एलिंग्टन कोचिंग और खिलाड़ियों की सहायता के ज़रिए फुटबॉल से जुड़े रहे। युवाओं को उनकी सलाह में मेहनत और नमाज़ की रक्षा दोनों थे। उनकी यात्रा अपने परिचित मैदान में चुने हुए विश्वास के साथ जीना सीखने की थी, और फिर उन्हीं शुरुआती प्रश्नों से जूझ रहे दूसरों का साथ देने की।

स्रोत

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