दियान सास्त्रोवार्दोयो: एक प्रश्न से खुला सीखने का रास्ता

दियान सास्त्रोवार्दोयो बचपन से धार्मिक विविधता से परिचित थीं। उनका पालन-पोषण कैथोलिक परंपरा में हुआ, जबकि पिता बौद्ध थे। माध्यमिक विद्यालय में उन्होंने दर्शन पढ़ना और ईश्वर तथा जीवन के बारे में प्रश्न करना शुरू किया। वह ऐसे उत्तर चाहती थीं जिन्हें समझ सकें, केवल विरासत में मिली पहचान नहीं।
इस जिज्ञासा ने उन्हें कई धर्मों को जानने की ओर बढ़ाया। बाद में उन्होंने एक प्रश्न याद किया: यदि संसार का अंत होना है, तो उसे बनाया ही क्यों गया? उन्होंने विभिन्न परंपराओं के धर्मगुरुओं से पूछा और बताया कि उस समय मिले उत्तरों से उनकी उलझन दूर नहीं हुई।
एक रिश्तेदार उन्हें इस्लामी अध्ययन की सभा में ले गईं। वह बहुत अपेक्षा लेकर नहीं गई थीं, लेकिन वहाँ एक शिक्षक ने उनके प्रश्नों पर समझ आने वाले ढंग से चर्चा की और कुरआन से समझाया। उनके विवरण में महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि प्रश्नों को टाला नहीं गया।
उन्होंने सीखना जारी रखा और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में इस्लाम चुना। इसके बाद प्रश्न व्यावहारिक भी हो गए। उन्होंने कुरआन की पहली सूरह, अल-फ़ातिहा, याद करनी शुरू की। अपरिचित अरबी ध्वनियाँ कठिन थीं। वह केवल आवाज़ें दोहराना नहीं, नमाज़ में कही जाने वाली बातों का अर्थ समझना चाहती थीं।
माँ के साथ उनका संबंध इस यात्रा का हिस्सा बना रहा। 2021 में उन्होंने माँ के सहयोग का ज़िक्र किया: वह चाहती थीं कि बेटी अपनी मान्यता का गंभीरता से पालन करे और निर्णय स्वयं की समझ से ले। बाद में कुरआन पढ़ना सीखने में यह सहयोग व्यावहारिक रूप में मिला, जबकि दोनों की आस्थाएँ अलग थीं।
2015 में साझा किए गए बयान में उन्होंने 2010 के विवाह से पहले कुरआन की पूरी पढ़ाई समाप्त करने को याद किया। माँ ने प्रोत्साहित किया, पाठ सीखने का परिश्रम समझा और उनके पास उपस्थित रहीं। 2024 में यात्रा सुनाते समय भी फ़ातिहा और उसका अर्थ सीखना उनकी स्मृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।
यह कहानी बौद्धिक प्रश्न को पढ़ना और नमाज़ सीखने की रोज़मर्रा की मेहनत से जोड़ती है। संतोषजनक उत्तर मिलने पर काम पूरा नहीं होता; नया चरण शुरू होता है। क्या हम प्रश्न को गंभीरता से सुनने के बाद सीखने के छोटे, निरंतर कदमों में भी सहायता करते हैं?
