सभी कहानियों पर वापस जाएँ

अब्दुल-लतीफ़ अब्दुल्लाह: जब सिलाट ने रोज़मर्रा के ईमान का दरवाज़ा खोला

गर्म रोशनी में कालीन पर रखी बंद क़ुरआन
Malik Shibly / Unsplash — source · license.

आदत से आगे के सवाल

1998 में स्टीवन एरिक क्राउस न्यूयॉर्क सिटी में स्नातकोत्तर छात्र थे। प्रोटेस्टेंट परिवार में पले होने के बावजूद वे धार्मिक अभ्यास से दूर हो चुके थे और ऐसी आध्यात्मिक अर्थवत्ता खोज रहे थे जिसे वे किसी संस्था तक सीमित नहीं मानते थे। उनके सवाल केवल नया नाम अपनाने के नहीं थे; वे ईश्वर, सीधी प्रार्थना और रोज़मर्रा के जीवन में धर्म की जगह को स्पष्ट समझना चाहते थे।

बाद में अब्दुल-लतीफ़ अब्दुल्लाह नाम से लिखे अपने वृत्तांत में उन्होंने इन प्रश्नों को अपनी उस समय की समझ तक ही रखा। उन्होंने स्वयं को इस्लाम का पहले से जानकार नहीं बताया; वे उसके बारे में बहुत कम जानते थे। निर्णय तक की दूरी एक मूल समीक्षा से भरी थी—ईश्वर के बारे में उनका विश्वास क्या है, और क्या आस्था जीने का रास्ता बन सकती है?

सिलाट की कक्षा से एक मुस्लिम घर तक

दरवाज़ा एक अप्रत्याशित दिशा से खुला। उनका यहूदी रूममेट मलेशियाई मार्शल आर्ट सिलाट सीखता था और उसके आध्यात्मिक पक्ष की बात करता था। 28 फ़रवरी 1998 की शनिवार सुबह वे उसके साथ कक्षा में गए। वहाँ उनकी मुलाकात उस शिक्षक से हुई जिसे वृत्तांत में केवल “Cikgu S.” कहा गया है। मार्शल आर्ट का आरंभ धीरे-धीरे इस्लाम से परिचय बन गया।

यह परिचय किसी एक बहस से नहीं हुआ। उन्होंने शिक्षक के घर बहुत समय बिताया; 1998 के वसंत में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे और उनका रूममेट पूरा ग्रीष्म शिक्षक और उनकी पत्नी के साथ रहे। नमाज़, अनुशासन और ईश्वर की चर्चा एक ऐसे घरेलू क्रम में दिखे जिसे वे प्रत्यक्ष देख सकते थे। उनके लिए दूर से धर्म सुनने और उसे दिनचर्या बनाते देखने में यही अंतर था।

लंबी समीक्षा के बाद निर्णय

समझ बढ़ी तो पुराने प्रश्न अधिक गंभीरता से लौटे। उन्होंने पहली कक्षा से शहादा तक के समय को अपनी संस्कृति, ईश्वर की समझ और जीवन में धर्म की भूमिका की जाँच कहा। उनका वृत्तांत निर्णय को किसी चमत्कारी वाक्य या अचानक दृश्य में सीमित नहीं करता; वह महीनों की सीख, अवलोकन और आत्मपरीक्षण से उभरता है।

अब्दुल्लाह ने स्वयं शहादा की तारीख़ 30 जुलाई 1999 लिखी। जाँचे गए वृत्तांत में स्थान, गवाह, रस्म या शब्द नहीं दिए गए हैं, इसलिए कोई अनुपस्थित दृश्य नहीं गढ़ा गया। सुरक्षित तथ्य उनका प्रकाशित दिन है और पहली सिलाट कक्षा से निर्णय तक लगभग सत्रह महीने का क्रम।

शहादा पर समाप्त न होने वाली सीख

निर्णय के बाद हर कठिनाई समाप्त नहीं हुई। उन्होंने अमेरिका में रहते हुए नई सांस्कृतिक और व्यावहारिक अपेक्षाओं से तालमेल का वर्णन किया। परिवार को पता चला तो, उनके अनुसार, प्रश्न ईश्वर में विश्वास से अधिक विवाह, सामाजिक जीवन और पारिवारिक संबंधों पर थे। चुनौती समझने के लिए इतना पर्याप्त है; निजी विवरण आवश्यक नहीं।

2007 में लिखते हुए उन्होंने निरंतर शिक्षा और ऐसे शिक्षक की अहमियत पर बल दिया जो ज्ञान को जीवन से जोड़ सके। विश्वविद्यालय की औपचारिक जीवनी स्टीवन एरिक क्राउस और अब्दुल लतीफ़ अब्दुल्लाह की सार्वजनिक पहचान को स्वतंत्र रूप से जोड़ती है, पर धर्म-परिवर्तन की गवाह नहीं है। यह ऐतिहासिक यात्रा ईश्वर के प्रश्नों से शुरू होकर दिखाई देने वाले दैनिक अभ्यास, दिनांकित निर्णय और सीखते रहने की नई जिम्मेदारी तक पहुँचती है।

स्रोत

  1. Abdul-Lateef Abdullah — first-person account, part 1 (2007)
  2. Abdul-Lateef Abdullah — first-person account, part 2 (2007)
  3. Universiti Putra Malaysia — institutional CV · Universiti Putra Malaysia — official identity listing
  4. About Islam — author profile
  5. About Islam — later bylined republication

कहानी सूची पर लौटें