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रानिया याप: जब पहला क़दम उत्तर से पहले आता है

कहानी के साथ चित्र

क्या किसी आस्था को समझने की शुरुआत तभी हो सकती है, जब उसके बारे में हर सवाल का जवाब मिल चुका हो? और अगर उस शुरुआत का कोई हिस्सा सबको दिखाई दे, तो अपने सवालों को समझने के लिए निजी जगह कैसे बची रहे?

मलेशिया की चीनी मूल की फ़ेलिक्सिया याप, जिन्हें बाद में रानिया याप के नाम से जाना गया, ने इस्लाम स्वीकार करने की घोषणा से पहले हिजाब पहनना शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने कई महीने इस्लाम के बारे में सीखा। [1][2]

जिस चीज़ की तलाश थी, वह केवल एक नया रूप नहीं था

3 जुलाई 2014 को अपने ब्लॉग में याप ने लिखा कि उनका बचपन किसी निश्चित धार्मिक पहचान या धार्मिक शिक्षा के बिना बीता था। ईश्वर को खोजते हुए वह दो साल तक रविवार की शाम कैथोलिक चर्च गईं। उन्होंने गुआन यिन और बौद्ध परंपरा से जुड़ी धार्मिक प्रथाओं को भी जाना। [1]

उन्होंने जो बात अपने बारे में कही, वह यह थी कि उन्हें ईश्वर से वह निकटता नहीं मिली थी, जिसकी वह तलाश कर रही थीं। इस्लाम के बारे में सीखने के साथ उन्होंने एक अलग निकटता महसूस करने की बात लिखी। [1]

उनके जीवन में अर्थ का प्रश्न भी था। मॉडलिंग की दुनिया में वर्षों बिताने के बाद वह उस माहौल से परिचित थीं, जहाँ सुख को अक्सर संपत्ति, रूप और लोगों का ध्यान मिलने से जोड़ा जाता है। उन्होंने अपने भीतर के खालीपन का ज़िक्र किया। उनके अनुसार, बाहरी चमक उनके उस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पा रही थी। [1]

सीखने का समय, लोगों की निगाहों के बीच

जब उन्होंने हिजाब पहनना शुरू किया, तब वह मुसलमान नहीं थीं। औपचारिक घोषणा से पहले हिजाब पहनते और इस्लाम सीखते हुए उन्हें लगभग सात महीने हो चुके थे। [1]

जिस बदलाव को लोग देख सकते थे, उस पर प्रतिक्रियाएँ भी आईं। उन्होंने अपमान, उपहास, आरोप, अलग कर दिए जाने और दबाव का उल्लेख किया। साथ ही, हौसला देने और साथ निभाने वालों का आभार भी जताया। [1]

उन्होंने जो परिवर्तन बताए, वे केवल पहनावे तक सीमित नहीं थे। उनके अनुसार, वह अधिक शांत हुईं, जीवन को अधिक स्वीकार करने लगीं और साधारण जीवन के लिए भी आभार महसूस करने लगीं। महँगी चीज़ें और चकाचौंध पहले जैसी आकर्षक नहीं रहीं। उन्होंने पश्चात्ताप और बेहतर इंसान बनने की इच्छा की बात भी की। [1]

नया विश्वास, मिटाई न गई पहचान

याप की माँ ने उनके निर्णय का समर्थन किया। [1]

उनकी माँ मुसलमान नहीं थीं और इस्लाम के बारे में बहुत कम जानती थीं। फिर भी उन्होंने अपनी बेटी में अधिक परिपक्वता और अच्छे बदलाव देखे थे। [1]

याप ने अपनी चीनी पहचान बनाए रखने की बात स्पष्ट रूप से कही। माँ का दिया हुआ चीनी नाम भी वह रखना चाहती थीं। नया नाम उसमें जुड़ना था, उसे मिटाना नहीं था। [1]

आस्था की घोषणा का दिन

3 जुलाई 2014 को, अपने अट्ठाईसवें जन्मदिन पर, याप ने ब्लॉग में ईश्वर की खोज की अपनी यात्रा लिखी। उन्होंने कहा कि दिल से वह इस्लाम स्वीकार कर चुकी थीं और अब परिवार तथा समर्थन देने वाले निकट लोगों की उपस्थिति में गवाहों के सामने शहादा पढ़ने की तैयारी कर रही थीं। वह इस अवसर को मीडिया की कवरेज से दूर रखना चाहती थीं। [1]

mStar द्वारा प्रकाशित उनकी घोषणा के अनुसार, उसी शाम उन्होंने कुआलालंपुर के तमन तुन डॉ. इस्माइल क्षेत्र की एक मस्जिद में शहादा पढ़ी। रिपोर्ट में उनकी माँ और चार गवाहों की उपस्थिति का भी उल्लेख था। [2]

उन्होंने नए नाम को एक सपने से जोड़ा था। [1][2]

निर्णय के बाद का जीवन

2015 में रानिया ने इस्लाम अपनाने के बाद के जीवन पर #Baby Muslimah नामक पुस्तक के सहलेखन में भाग लिया। [4]

जुलाई 2017 में उन्होंने ऑनलाइन इस्लाम का परिचय देने, परोपकार के अवसर खोजने और आलोचना का विनम्र उत्तर देने, पर लगातार अपमान करने वालों को ब्लॉक करने की बात बताई। [5]

शुरुआत को पूरी मंज़िल न समझें

आस्था से पहला परिचय हमेशा किसी औपचारिक बौद्धिक बहस से नहीं होता। कभी कोई किताब, कोई मित्र या जीवन का अनजान अभ्यास प्रश्न जगाता है। ऐसी शुरुआत को छोटा मानने की आवश्यकता नहीं, लेकिन उसे सभी प्रश्नों का उत्तर भी नहीं मान लेना चाहिए।

लगभग सात महीने सीखने के बाद याप ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी चीनी पहचान और माँ का दिया हुआ नाम बनाए रखा। [1][2]

स्रोत