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अब्दुर्रहीम ग्रीन: सवालों से क़ुरआन तक का सफ़र

गर्म रोशनी में कालीन पर रखा बंद कुरआन
चित्र: Qur’an still life — Malik Shibly / Unsplash (Unsplash लाइसेंस).

एंथनी ग्रीन का पालन-पोषण कैथोलिक वातावरण में हुआ और उन्होंने इंग्लैंड के एक धार्मिक आवासीय विद्यालय में पढ़ाई की। लेकिन इस शिक्षा से ईश्वर और जीवन के उद्देश्य को लेकर उनके सवाल समाप्त नहीं हुए। 1997 में प्रकाशित साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि बचपन से सिखाई गई कुछ मान्यताओं को समझना उनके लिए कठिन था, इसलिए उन्होंने परिचित उत्तरों के बाहर भी तलाश शुरू की।

पिता के काम के कारण स्कूल की छुट्टियों में उनका मिस्र जाना होता था। वह देश भी उनकी खोज का हिस्सा बन गया। उनके अनुसार, वहाँ मिले कुछ लोगों की नमाज़ और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का ढंग उन्हें प्रभावित करता था। एक मिस्री व्यक्ति के साथ मसीह के ईश्वर होने और मृत्यु के विषय में हुई बातचीत ने उनके पुराने संदेह सामने रख दिए। उन्होंने इस बातचीत को इस्लाम स्वीकार करने का क्षण नहीं बताया।

उनका अध्ययन इतिहास, दर्शन और विभिन्न धर्मग्रंथों तक फैला। कुछ समय उन्होंने बौद्ध अभ्यास भी किए, लेकिन औपचारिक रूप से उस धर्म में प्रवेश नहीं किया। क़ुरआन पढ़ने से उनकी खोज को नई दिशा मिली। उन्होंने बताया कि वह इसे ईश्वर का संदेश मानने लगे थे। एक ईश्वर में विश्वास और इस किताब पर भरोसा, अलग-अलग विचारों के बीच उनकी तलाश की जगह लेने लगे।

उन्होंने 1980 के दशक के अंत में, लगभग 1987–1988 के दौरान इस्लाम स्वीकार किया और अब्दुर्रहीम ग्रीन के नाम से जाने गए। अपना सफ़र सुनाते समय उन्होंने मार्गदर्शन का श्रेय अल्लाह को दिया। उनके वर्णन में सवाल, अध्ययन और संवाद साथ आते हैं; उन्होंने अपने निर्णय को किसी समाज की प्रशंसा या किसी एक व्यक्ति से मुलाक़ात तक सीमित नहीं किया।

बाद में इस्लाम का अध्ययन करने के साथ वह दूसरों को उसके बारे में बताने लगे। 1997 के साक्षात्कार में उन्होंने एक इस्लामी मीडिया संस्था में काम करने और लंदन के हाइड पार्क में भाषण देने का उल्लेख किया। वर्षों बाद iERA ने मलावी में 2017 के एक कार्यक्रम में उनकी भागीदारी दर्ज की। वहाँ उन्होंने अपनी यात्रा सुनाई; कार्यक्रम में संवाद, शिक्षा और नए मुसलमानों को सहयोग देने की गतिविधियाँ भी थीं।

उनकी कहानी निजी सवालों से उन लोगों के साथ संवाद तक पहुँचती है जिनके अपने सवाल थे। दावत की चर्चा करते हुए उन्होंने केवल अल्लाह की इबादत की ओर बुलाने पर बल दिया। अध्ययन और बातचीत उनके बताए रास्ते के केंद्र में रहे: पहले वह उत्तर खोज रहे थे, फिर जो उत्तर उन्हें सही लगे, उन्हें दूसरों के साथ साझा करने लगे।

स्रोत

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