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महमूद अब्दुल-रऊफ़: अर्थ की खोज से जीवन को नया क्रम देने वाले विश्वास तक

ऊपर से रोशन खाली इनडोर बास्केटबॉल कोर्ट
चित्र: Fulvio Ambrosanio · Unsplash लाइसेंस

बास्केटबॉल की दुनिया उन्हें महमूद अब्दुल-रऊफ़ के नाम से जानती, उससे पहले वे गल्फपोर्ट, मिसिसिपी के क्रिस जैक्सन थे। वे अपनी माँ और भाइयों के साथ गरीबी में, पिता से दूर, एक धर्मनिष्ठ बैपटिस्ट वातावरण में बड़े हुए। ग्यारहवीं कक्षा तक उनके टॉरेट सिंड्रोम का निदान नहीं हुआ था—अनियंत्रित हरकतें, अचानक आवाज़ें और किसी काम को तब तक दोहराने की मजबूरी जब तक वह “ठीक” न लगे। उन्होंने बाद में बताया कि बचपन में कभी-कभी यह सोचकर रोते हुए सोते थे कि शायद उन्हें कोई गंभीर बीमारी है। इस अनुभव ने अर्थ, शांति और व्यवस्था की उनकी खोज को गहरा किया।

बास्केटबॉल वह जगह बना जहाँ कठिन दोहराव कौशल में बदल सकता था। युवावस्था में वे सुबह चार बजे उठकर ठंड और खराब मौसम में अभ्यास करते थे। यही मेहनत उन्हें LSU और फिर NBA तक ले गई। सफलता ने धार्मिक प्रश्न समाप्त नहीं किए। उन्होंने कहा कि वे लगातार प्रार्थना करते थे—चलते हुए, घुटनों पर और दिन भर—लेकिन प्रश्न पूछने पर कभी केवल “विश्वास करो” या “ईश्वर से प्रश्न मत करो” सुनते। वे ऐसा विश्वास चाहते थे जिसमें ईमानदार प्रश्न उत्तर की ओर जा सके।

एक दूसरा संघर्ष अमेरिकी दक्षिण में उनके बचपन से था। सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने अश्वेत और श्वेत लोगों के बीच असमान संबंध देखे, यद्यपि तब उसे पूरी भाषा में व्यक्त नहीं कर पाते थे। उन्होंने वयस्कों को सार्वजनिक टकराव में आवाज़ नीची करते और घर पर निर्भीक बोलते देखा। अपना मौन भी उन्हें भीतर से परेशान करता था। वे ईश्वर से प्रार्थना करते कि एक दिन सत्य बोलने और परिणाम सहने की शक्ति मिले।

LSU में कोच डेल ब्राउन ने उन्हें The Autobiography of Malcolm X दी। मैल्कम की प्रश्न पूछने, स्वयं को सुधारने और लोकप्रियता से ऊपर सत्य रखने की क्षमता ने उन्हें प्रभावित किया। यह तुरंत इस्लाम स्वीकारने की घटना नहीं थी। पुस्तक ने पहली बार ऐसा व्यक्ति दिखाया जिसने अधिक सत्य प्रतीत होने वाली बात मिलने पर स्वयं को बदला और विश्वास को गरिमा व न्याय से जोड़ा। पुस्तक द्वार बनी, मंज़िल नहीं।

1990 में डेनवर पहुँचने के बाद खोज गहरी हुई। यात्राओं में मुसलमान उनसे होटल में देर रात तक धर्म, समाज और राजनीति पर बात करते तथा नए लेखकों से परिचित कराते। अभ्यास के बाद वे डेनवर की एक इस्लामी किताबों की दुकान में समय बिताते, मालिक के साथ चाय पीते, पढ़ते और प्रश्न करते। इसलिए उनका मार्ग एक नाटकीय क्षण नहीं, बल्कि संगति, पुस्तकों और विचार का संचय था।

फिर उन्हें कुरआन मिला। निकट-समकालीन रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती पन्ने उन्हें सीधे संबोधित करते लगे; बाद की गवाही कहती है कि कुरआन विषय-दर-विषय उनकी जिज्ञासा खोलता रहा। हर प्रश्न और निर्णय-पूर्व संवाद सुरक्षित नहीं है, इसलिए पूरा दृश्य गढ़ना अनुचित होगा। इतना स्पष्ट है कि मैल्कम ने खोज शुरू कराई, कुरआन उसका केंद्र बना, और इस्लाम ने ईश्वर की उपासना को नैतिकता, न्याय और दैनिक जीवन से जोड़ा।

पहले NBA सत्र के बाद उन्होंने 1991 में इस्लाम स्वीकार किया। उपलब्ध स्रोत शहादा का दिन, मस्जिद या गवाह नहीं बताते। निर्णय को कुछ पन्नों की क्षणिक भावना तक सीमित करना भी गलत है; उस स्पष्टता से पहले प्रार्थना, प्रश्न, पढ़ना, मुलाकातें और संवाद थे, और उसके बाद अभ्यास आया।

उन्होंने बास्केटबॉल से मिलने वाली अस्थायी राहत के विपरीत इस्लाम को “पूर्ण शांति” देने वाला बताया। उन्होंने नमाज़ के अनुसार दिन व्यवस्थित किए, खूब पढ़ा, पेशेवर खेल के दौरान रमज़ान के रोज़े रखे और यात्राओं में मुसलमानों व मस्जिदों से जुड़े। 1993 की गर्मियों में हज किया और औपचारिक रूप से महमूद अब्दुल-रऊफ़ नाम अपनाया। नाम ने पहले से चुनी पहचान सार्वजनिक की; वह दूसरा धर्म-परिवर्तन नहीं था।

विश्वास ने जीवन से कीमत नहीं हटाई। कुछ संबंध बदले और उन्हें लगा कि आस्था सार्वजनिक निर्णयों में भी दिखाई देनी चाहिए। बाद में राष्ट्रगान के प्रसंग में उन्हें निलंबन, विरोध और पेशेवर हानि हुई। वे उसे धार्मिक और नैतिक प्रतिबद्धता से समझाते हैं, पर वह बाद का अध्याय है; उसे इस्लाम स्वीकारने की पूरी कहानी नहीं बनाना चाहिए और न उनकी हर राजनीतिक राय को इस्लामी सिद्धांत मानना चाहिए।

दशकों बाद भी वे विश्वास को सत्यनिष्ठा, साहस और न्याय की चिंता से जोड़ते हैं, साथ ही प्रमाण से स्वयं को सुधारने की खुली जगह रखते हैं। उन्होंने उस बच्चे को याद किया जो चुप रहकर भीतर दुखता था, और उन कहानियों व संगत को भी जिन्होंने भाषा और शक्ति दी। टॉरेट समाप्त नहीं हुआ और कठिनाइयाँ भी पूरी तरह नहीं गईं, लेकिन सफलता अब केवल अंक और अनुबंध नहीं रही।

यह कहानी इसलिए प्रेरक है कि यह न दर्द-रहित रास्ता दिखाती है, न प्रसिद्धि को हिदायत का प्रमाण बनाती है। एक व्यक्ति पुराने प्रश्नों को नए स्रोतों तक ले गया; एक आदर्श से द्वार खुला, पर वह कुरआन तक आगे बढ़ा और फिर विश्वास को आदतों व चुनावों में परखा। खोजने वाले के लिए सीख है: सच्चे प्रश्न से न डरें, विरासत में मिली छवि पर न रुकें, मूल स्रोत तक जाएँ और जिस सत्य पर विश्वास हो उसे दैनिक जीवन में वास्तविक स्थान दें।

स्रोत

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