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ओलेग कालेंचुक: जब जीवन के उद्देश्य के प्रश्न को एकेश्वरवाद में उत्तर मिला

खाली कार्य-मेज़ पर रखा जलरंगों का डिब्बा और चित्रकारी की कूचियाँ

ओलेग पेत्रोविच कालेंचुक किसी जल्दी मिलने वाली पहचान की तलाश में नहीं थे। सिम्फ़ेरोपोल के इस कलाकार ने इस्लाम से पहले के जीवन को सत्य की लंबी खोज के रूप में बताया। उन्होंने बाइबल और भगवद्गीता पढ़ी, योग, पूर्वी धर्मों तथा दर्शन में रुचि ली और प्रोटेस्टेंट चर्चों में भी गए। फिर भी एक प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला: हम क्यों जीते हैं और ईश्वर ने हमें क्यों बनाया?

उन्होंने क़ुरआन का रूसी अनुवाद खरीदा, लेकिन पहली बार पढ़ने पर अर्थ नहीं खुला। उनके अनुसार उन्होंने पुस्तक पूरी करने का लक्ष्य रखा और फिर दूसरी बार पढ़ा। पहली कठिनाई को अंतिम निर्णय नहीं माना; वे पाठ पर लौटे। उनकी उपमा में विचार आत्मा में गिरते बीजों जैसे थे, जो धीरे-धीरे उगने लगते हैं।

तीसरी बार पढ़ते हुए वे ऐसे अंश तक पहुँचे जिससे उन्होंने समझा कि परम दयालु को संतान की आवश्यकता नहीं। पुराना प्रश्न अब ईश्वर की एक स्पष्ट धारणा से मिला: वह एक है, उसकी कोई संतान नहीं, वह सर्वशक्तिमान, आकाशों और धरती का सृष्टा तथा सबसे निरपेक्ष है। उन्होंने कहा कि यह वर्णन सृष्टिकर्ता के बारे में उनकी समझ से मेल खाता था और सत्य स्पष्ट हो गया। उन्होंने निर्णय को क्षणिक प्रभाव नहीं, बल्कि तुलना और बार-बार पढ़ने के बाद मिले धार्मिक उत्तर से जोड़ा।

जिस दिन यह समझ स्थिर हुई, वे सीधे मस्जिद गए। उन्होंने टैक्सी ली क्योंकि उन्हें डर था कि इस्लाम स्वीकार करने से पहले मृत्यु न आ जाए। साक्षात्कार उस दिन को स्पष्ट रूप से याद करते हैं, पर तारीख़ प्रकाशित नहीं करते। 2011 में सत्रह वर्ष, 2014 में लगभग बीस वर्ष और 2018 में तेईस वर्ष पहले की तीन गणनाएँ समय को लगभग 1994–1995 में रखती हैं, किसी प्रमाणित दिन पर नहीं।

सिम्फ़ेरोपोल की केबिर-जामी मस्जिद में शुरुआत केवल निर्णय पर नहीं रुकी। उन्होंने बताया कि वहाँ लोगों ने किताबें दीं, नमाज़ सिखाई और संगति तथा मार्गदर्शन दिया। इसी अनुभव से उन्होंने व्यावहारिक सलाह निकाली: नए मुस्लिम को आरंभ में सहायता करने वाला कोई व्यक्ति चाहिए; बड़े निर्णय और अभी बन रहे ज्ञान के बीच उसे अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

इस यात्रा की क़ीमत भी थी। उनकी पहली साथी बेटी को लेकर चली गईं, माता-पिता उनके चुनाव से डरे और कुछ मित्रों ने उपहास किया। बाद में व्यवहार में आए बदलाव देखकर परिवार का दृष्टिकोण बदला। वर्षों बाद उनकी माँ ने इस्लाम अपनाया और बाद में जिनसे उन्होंने विवाह किया, वे भी मुस्लिम हुईं। प्रकाशित कथनों में ये हर व्यक्ति के अपने निर्णय हैं; इन्हें किसी एक पुरुष का स्वतः उत्पन्न प्रभाव नहीं कहा जा सकता।

ओलेग ने मुहम्मद अली नाम भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि इस्लाम ने उन्हें कृतज्ञता और अपनी चीज़ों की क़द्र करना सिखाया, और वे कला को सृष्टि के माध्यम से सृष्टिकर्ता पर चिंतन से जोड़ने लगे। दस वर्ष से अधिक समय तक उन्होंने लोगों से यह पूछने वाली पुस्तक के लिए सामग्री जुटाई कि वे इस्लाम में क्यों आए; 2015 में हज किया और उसे चित्रों की एक शृंखला का विषय बनाया। स्रोत कहानी की सीमाएँ भी बताते हैं: शहादा की दैनिक तारीख़ और उस क्षण के प्रकाशित गवाह नहीं हैं। जो क्रम देखा जा सकता है वह उद्देश्य के प्रश्न से बार-बार पढ़ने, एकेश्वरवाद की निर्णायक समझ और फिर निर्णय को दैनिक जीवन तक पहुँचाने वाली संगति का है।

स्रोत

फ़ोटोग्राफ़: Sixteen Miles Out / Unsplash.

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