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स्टीफ़न मैकगाउन: आज़ादी में लौटे एक बंदी के वृत्तांत में आस्था

गर्म रोशनी में कालीन पर रखी बंद क़ुरआन
Malik Shibly / Unsplash — स्रोत · लाइसेंस.

स्टीफ़न मैकगाउन दक्षिण अफ़्रीका में कैथोलिक पृष्ठभूमि में पले-बढ़े और कई वर्ष लंदन के बैंकिंग क्षेत्र में काम करते रहे। घर लौटने का निर्णय किया तो मोटरसाइकिल से अफ़्रीका पार करने निकल पड़े। नवंबर 2011 में माली के टिम्बकटू में अल-क़ायदा के हथियारबंद लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। जुलाई 2017 तक वह बंदी रहे। घर लौटने की नियोजित यात्रा ऐसी प्रतीक्षा बन गई जिसका अंत दिखाई नहीं देता था।

बाद में उन वर्षों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि बंदी बनाने वालों के नियंत्रण में भी अपनी मनुष्यता बनाए रखना उनके लिए बड़ा प्रश्न था। परिवार की ख़बर नहीं मिलती थी, शिविर बदलते रहते थे और वह गतिविधियों तथा छोटे-मोटे कामों से दिन भरने की कोशिश करते थे। रिहाई के बाद उन्होंने कहा कि वह अपनों के पास इस तरह लौटना चाहते थे कि क्रोध उनके शेष जीवन पर हावी न हो।

मैकगाउन ने बंदी रहते हुए इस्लाम स्वीकार किया। अगस्त 2017 की पत्रकार वार्ता में उन्होंने इसे अपना निर्णय बताया। वहीं, 2019 के एक वृत्तचित्र साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि एक साथी के धर्म परिवर्तन के बाद उन पर पाबंदियाँ बढ़ गई थीं; उन्हें चलने-फिरने की ज़रूरत थी और अपने स्वास्थ्य की चिंता थी। उनके वृत्तांत में व्यक्तिगत चुनाव और क़ैद का दबाव, दोनों मौजूद हैं। निर्णय की शुरुआत उन्हीं कठिन परिस्थितियों में हुई थी।

उनके अनुसार, इस्लाम स्वीकार करने के बाद व्यवहार बदला: बेहतर भोजन और कपड़े मिले तथा वह तिलावत में शामिल हुए। लेकिन उन्होंने बार-बार कहा कि वह अब भी बंदी थे। रोज़मर्रा की कुछ सुविधाओं में सुधार आज़ादी नहीं था। धार्मिक परिवर्तन ने न उनकी क़ैद समाप्त की, न उन पर थोपी गई अलगाव और अनिश्चितता की स्थिति।

2017 में घर लौटकर उन्होंने इस्लाम में मिली अच्छाइयों, विशेषकर अच्छे आचरण और लोगों की देखभाल का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने माना कि कुछ बातें उन्हें अभी भी असहज करती थीं और वह आगे पढ़ना चाहते थे। उस समय उनके वर्णन में आकर्षण और अनुत्तरित प्रश्न साथ मौजूद थे; उन्होंने अपनी यात्रा को सभी उत्तर मिल जाने वाली कहानी नहीं बताया।

दिसंबर 2020 में Radio Islam द्वारा प्रकाशित साक्षात्कार में उन्होंने उस निर्णय के आरंभ को अधिक विस्तार से समझाया। उन्होंने स्वीकार किया कि शुरुआती प्रेरणाओं पर जान का भय भी असर डाल रहा था। फिर उन्होंने लोगों का साथ देने, बुरी बात कहने से बचने तथा पड़ोसियों और माता-पिता की देखभाल संबंधी शिक्षाओं में मिली समझ का वर्णन किया। इन्हीं नैतिक बातों को उन्होंने स्पष्ट रूप से इस्लाम की ओर आकर्षित करने वाले पहलुओं में गिना।

उन्होंने अपनी सीख को जीवन जीने और लोगों से व्यवहार करने का तरीका बताया, केवल अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठानों का समूह नहीं। यह बात वह रिहाई के तीन वर्ष बाद, अपने अनुभव पर लिखी पुस्तक का परिचय देते समय कह रहे थे। इस बाद के वृत्तांत ने धर्म परिवर्तन की पुरानी ख़बर में उनका अपना स्पष्टीकरण जोड़ा कि उनकी समझ में किन बातों का महत्त्व बना रहा।

2022 के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने बदलाव स्वीकार करने और एक-एक दिन करके जीवन का सामना करने की बात की। वह लिखने और लोगों के सामने उन खोए हुए वर्षों के बारे में बोलने लगे थे। उनके प्रकाशित वृत्तांत में आज़ादी में वापसी एक अलग अध्याय है: परिवार से मिलना और अपहरणकर्ताओं के नियंत्रण से बाहर जीवन तथा धर्म पर विचार जारी रखने का अवसर।

स्रोत

  1. Ray White — 09/08/2022
  2. Mail & Guardian — 10/08/2017
  3. Voice of the Cape / News24 — 11/08/2017
  4. SVT — 01/09/2019
  5. Radio Islam — 07/12/2020

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