जी. विलो विल्सन: जब अनसुनी-सी प्रार्थना एक लंबी तलाश बन गई

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जब उन्होंने इस्लाम को जाना
जी. विलो विल्सन की इस्लाम-यात्रा किसी धार्मिक घर से या आध्यात्मिक प्रश्नों से खाली जीवन से शुरू नहीं हुई। अमेरिका में उनका पालन-पोषण नास्तिक माता-पिता ने किया। दोनों ने अपने-अपने रूढ़िवादी प्रोटेस्टेंट चर्च छोड़े थे, क्योंकि उनके अनुभव में धार्मिक भाषा नस्लवाद या युद्ध के समर्थन से जुड़ गई थी। संस्थागत धर्म के प्रति उनकी सावधानी विल्सन तक पहुँची, लेकिन ईश्वर का प्रश्न उनके भीतर शांत नहीं हुआ।
उन्होंने नास्तिक बनने की कोशिश की, पर स्वयं को वैसा बना नहीं सकीं। कुछ समय तक ‘आध्यात्मिक, पर धार्मिक नहीं’ कहना उन्हें सुरक्षित दूरी देता रहा। वे दुनिया में अर्थ मान सकती थीं, बिना किसी संस्था के सामने समझ से पहले समर्पण किए। फिर भी बड़े प्रश्न वहीं रहे: ईश्वर कौन है? क्या मनुष्य सीधे ईश्वर की ओर मुड़ सकता है? क्या किसी व्यक्ति को अपने चुनाव से पहले विरासत में अपराध लेना चाहिए?
जब प्रश्न शरीर में उतर आया
उनकी अपनी गवाही के अनुसार, जनवरी 2001 में गर्भनिरोधक इंजेक्शन के बाद उन्हें एक दुर्लभ प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई, जिसके प्रभाव लगभग डेढ़ वर्ष रहे। मृत्यु और मानवीय दुर्बलता अब किताबों के विचार नहीं थे। शुरुआती भयावह दिनों में तीन मुसलमानों ने उनकी देखभाल की: एक ईरानी सहपाठी, उसकी नर्स माँ और विश्वविद्यालय की नर्स ख़दीजा।
डर के बीच उन्होंने ईश्वर से वह सौदा किया जिसे उन्होंने बाद में स्वयं इसी नाम से याद किया: यदि वे तीन दिनों में स्वस्थ हो जाएँगी तो मुसलमान बनेंगी। तीन दिन बीत गए और वे स्वस्थ नहीं हुईं। यह निराशा उन्हें आस्था से दूर ले जा सकती थी; इसके बजाय बीमारी ने उनके नियंत्रण की सीमा दिखा दी, जबकि दुनिया की सुंदरता बनी रही। उन्होंने स्वयं को न दंडित माना, न किसी असाधारण नियति के लिए चुना हुआ—वे बस बीमार थीं, और दुनिया फिर भी सुंदर थी।
प्रश्न बदल गया: यदि आस्था चमत्कार खरीदने का अनुबंध नहीं, तो ईश्वर पर विश्वास का अर्थ क्या है? उन्होंने पीड़ा को किसी तैयार धार्मिक वाक्य में बंद नहीं किया, पर इस संकट ने ऐसी खोज शुरू की जो तीन दिन की समय-सीमा के साथ समाप्त नहीं हुई।
आसान उत्तर से इनकार करने वाली खोज
बॉस्टन यूनिवर्सिटी में उन्होंने धर्म और अरबी का अध्ययन किया। इब्राहीमी परंपराओं को पढ़ते हुए उन्होंने ईश्वर, मनुष्य और मुक्ति की उनकी धारणाओं की तुलना की। ईसाई धर्म में त्रित्व और विरासत में मिले पाप की धारणा उनके लिए बाधा रही। बौद्ध धर्म ने दुःख पर दृष्टि दी, पर वह ईश्वर नहीं दिया जिसकी वे तलाश कर रही थीं। यहूदी धर्म कुछ प्रश्नों के निकट लगा, किंतु उस समय की उनकी समझ में उसका धार्मिक समुदाय उनके लिए सहज खुला मार्ग नहीं था।
इस्लाम में उन्हें स्पष्ट तौहीद मिली: एक ईश्वर जो मनुष्य नहीं बनता, किसी पर दूसरे का पाप नहीं रखता और जिसकी ओर इंसान बिना मध्यस्थ के मुड़ सकता है। ‘अल-हक़’—सत्य—नाम ने उन्हें छुआ, क्योंकि वे अस्थायी सांत्वना नहीं, परिस्थिति से परे सत्य चाहती थीं। ‘हो जा, तो वह हो जाता है’ के अर्थ ने उन्हें ईश्वरीय सामर्थ्य का ऐसा बोध दिया जो वास्तविकता को उनकी अपनी व्याख्या तक सीमित नहीं करता।
बौद्धिक संतोष अभी अंतिम निर्णय नहीं था। उन्होंने लिखा कि वे जानती थीं कि एक दिन मुसलमान बनेंगी, पर उन्हें अपने शब्दों में ‘रासायनिक और सामाजिक बैसाखियों’ को छोड़ने के लिए समय चाहिए था। प्रश्न ‘क्या इस्लाम सत्य है?’ से आगे बढ़कर ‘क्या मैं पहचाने हुए सत्य के अनुसार जीऊँगी?’ हो गया।
भूमध्य सागर के ऊपर लिया गया निर्णय
2003 की गर्मियों में वे काहिरा जा रही थीं। उनकी आत्मकथा से प्रकाशित सामग्री उस स्थिर निर्णय को भूमध्य सागर के ऊपर उड़ान के दौरान रखती है। निश्चित यह है कि वे उसी गर्मी में मुसलमान बनीं और यह निर्णय उमर से मिलने से पहले हुआ, जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया। इसलिए उनकी यात्रा को विवाह के लिए हुआ धर्मांतरण नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने पहले अपनी रूममेट और फिर परिवार को बताया। माता-पिता चिंतित हुए; धर्म के प्रति उनका संशय धार्मिक संस्थाओं के पुराने पीड़ादायक अनुभवों से बना था। फिर भी वे बेटी के साथ रहे। उन्हें उन छवियों और बेटी द्वारा जीए जा रहे विश्वास के बीच अंतर देखने के लिए समय चाहिए था।
इस्लाम के बाद: जीवन में परखी गई आस्था
शहादत ने जीवन को सरल नहीं बनाया। काहिरा में उन्होंने सीखा कि धार्मिक अभ्यास संस्कृति, राजनीति और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच जिया जाता है। हिजाब, अपनापन और पहचान के प्रश्नों के साथ वे एक अमेरिकी और मिस्र में रहने वाली मुस्लिम महिला होने की स्थितियों से गुज़रीं; बाद में अमेरिका में इस्लामोफ़ोबिया के सार्वजनिक प्रभावों का सामना भी किया।
यह अनुभव उनकी आत्मकथा, उपन्यासों और कॉमिक्स में आया। वे हर मुस्लिम पात्र को अपनी प्रतिलिपि या कथा को छिपा हुआ उपदेश नहीं बनाना चाहती थीं। उनका प्रयास उन पात्रों को वह मानवीय जटिलता देना था जिसे समाचार अक्सर भय या खतरे में घटा देते हैं। बाद की बातचीतों में उन्होंने धर्मांतरण और दो संसारों के बीच जीवन को अपनी अज्ञानता स्वीकार करने वाली विनम्रता से जोड़ा।
उन्हें इस्लाम तक माँगा हुआ चमत्कार नहीं लाया—वह हुआ ही नहीं। अकेली बीमारी भी कारण नहीं थी; उसने संकट खोला, उत्तर नहीं दिया। यात्रा दुर्बलता, तुलनात्मक अध्ययन, तौहीद की स्पष्टता और निर्णय की कीमत उठाने की तैयारी से बनी। यह उन लोगों को आशा देती है जिन्हें अचानक निश्चितता नहीं मिलती: कुछ परिवर्तन प्रश्न से शुरू होते हैं, निराशा और लंबे अध्ययन से गुजरते हैं, और तब परिपक्व होते हैं जब मनुष्य पहचाने हुए सत्य के अनुसार जीना चुनता है।
यह कहानी किस प्रश्न का उत्तर देती है
यदि उत्तर हमारे तय रूप और समय में न आए तो क्या करें? विल्सन ने जाना कि आस्था माँगा हुआ चमत्कार पाने से नहीं मापी जाती, बल्कि खोज जारी रखने से—जब तक ईश्वर की समझ स्पष्ट न हो और मनुष्य अपने पहचाने सत्य के साथ ईमानदारी से न जीने लगे।
स्रोत
- G. Willow Wilson on her bargain with God — The Independent, 12 September 2012
- The Butterfly Mosque — publisher page and memoir excerpt
- Heart and Soul — Boston University, Fall 2010
- Faith, fiction and justice — Princeton University, 26 April 2019
- A Conversation with G. Willow Wilson — Booth, 2 December 2022
फ़ोटो: Fontis AG / Unsplash.
