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रईस मोहम्मद: जब विरासत में मिली जाति से बाहर निकलना गरिमा की तलाश बन गया

सूर्यास्त के समय रोशनी से जगमगाती मस्जिद

क्या होता है जब किसी व्यक्ति का नाम, उसके बोलने से पहले ही, विरासत में मिले पेशे और तय सामाजिक स्थान का संकेत मान लिया जाए? रईस मोहम्मद ने भारत में यह प्रश्न रविचंद्रन बाथरन के रूप में जिया। उनके माता-पिता सफ़ाई के काम से जुड़े थे, और यह अनुभव उन्हें वर्षों तक जाति पर शोध और मीडिया कार्य की ओर ले गया।

2011 में उन्होंने दलित कैमरा की स्थापना की, जो दलित, आदिवासी, बहुजन और अल्पसंख्यक समुदायों की आवाज़ दर्ज करता है। कैमरा उनके लिए बाहर से देखने का साधन नहीं था; वह अपने परिवार और सफ़ाईकर्मियों के अपमान को समझने तथा श्रमिकों पर कलंक लगाने वाली भाषा को चुनौती देने का माध्यम था।

लंबी पड़ताल

2020 के अपने लेख में उन्होंने लिखा कि वे चौदह वर्षों से जाति का अध्ययन कर रहे थे और आठ वर्षों से दलित कैमरा के माध्यम से आंदोलन के साथ काम कर रहे थे। आंबेडकर और पेरियार के विचारों ने उनके सामने यह प्रश्न रखा कि जन्म के साथ थोप दी गई सामाजिक पहचान से बाहर कैसे निकला जाए।

इस्लाम उन्हें उस विरासत से बाहर निकलने का मार्ग लगा। अपने लेख में उन्होंने मस्जिदों की एक बात का विशेष उल्लेख किया: शौचालय उनके परिसर के भीतर थे। उन्होंने इसकी तुलना अपने परिचित सामाजिक परिवेश से की, जहाँ शौचालय घरों से बाहर होते थे और सफ़ाईकर्मियों को भीतर आने नहीं दिया जाता था। मस्जिदों के प्रति अपने आकर्षण को समझाते हुए उन्होंने इस अंतर को मनुष्य की गरिमा के प्रश्न से जोड़ा।

30 जनवरी

जनवरी 2020 में उन्हें केरल के कोडुंगल्लूर में एक सार्वजनिक सभा में बोलने के लिए बुलाया गया। वहीं 30 जनवरी को उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया और रईस मोहम्मद नाम अपनाया। यह तारीख उनके लिए राजनीतिक और मानवीय अर्थ रखती थी; बचपन में देखे इस नगर में अब वे एक नए निर्णय के साथ लौटे थे।

उन्होंने पुराने नाम को इसलिए नहीं छोड़ा कि माता-पिता के प्रेम को नकार दें। उनका विरोध उस जातिगत अर्थ और वंशानुगत पेशे से था जिसे समाज उस नाम पर थोपता था। मुसलमान बनने के बाद भी वे दलित कैमरा से जुड़े रहे। उनके लिए “दलित” गरिमा के संघर्ष और एकजुटता का संकेत था, वह जातिगत बोझ नहीं जिसे वे आगे ढोना चाहते थे।

नया नाम, जारी काम

सितंबर 2021 के साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि दलित कैमरा की टीम पर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दबाव बने हुए थे; काम शुरू करते समय उन्हें आर्थिक स्थिरता और व्यापक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली थी।

सफ़ाईकर्मियों के साथ उनका काम जारी रहा। सामाजिक न्याय में योगदान के लिए 9 अक्टूबर 2022 को उन्हें एम. रशीद पुरस्कार मिला। अगस्त 2024 के साक्षात्कार में उन्होंने वंचित समूहों के भीतर भेदभाव पर बात की। उसी परिचय में उनकी सेप्टिक टैंक साफ़ करने वाली कंपनी का भी उल्लेख था।

नाम बदलने के बाद भी श्रमिक की गरिमा उनके काम का हिस्सा रही। बाद की गतिविधियों और बयानों में वही सरोकार दिखाई दिया जो वर्षों से उनके साथ था: अनसुनी आवाज़ों को मंच देना और उस भेदभाव पर प्रश्न उठाना जिसे उन्होंने अपने परिवार और समुदाय में देखा था।

स्रोत

फ़ोटो: Brian Scott / Unsplash.