हाना ताजिमा: जब दर्शन के प्रश्न सूरह अल-इख़लास से मिले

ब्रिटिश-जापानी डिज़ाइनर हाना ताजिमा का पालन-पोषण डेवन के एक कलात्मक परिवार में हुआ। उन्हें आरंभ से यह जानने में रुचि थी कि लोग संसार को कैसे समझते हैं। कॉलेज के पहले वर्ष में उन्होंने दर्शन पढ़ा, मुस्लिम विद्यार्थियों से मित्रता की और खाली समय में धर्मों पर अनेक पुस्तकें पढ़ीं।
ताजिमा ने इस्लाम की ओर अपने बढ़ने को किसी अचानक घटना या एक व्यक्ति के प्रभाव के रूप में नहीं बताया। उनके अनुसार लगातार पढ़ने से उन्हें इस्लाम में वे सत्य मिलने लगे जो उनकी खोज से मेल खाते थे, यहाँ तक कि वे उस बिंदु पर पहुँचीं जहाँ अपने को गैर-मुस्लिम कहना संभव नहीं रहा।
इस यात्रा में सूरह अल-इख़लास का विशेष स्थान था। ईश्वर की एकता और शाश्वत आत्मनिर्भरता के उसके वर्णन में उन्हें अनंतता के उस प्रश्न की अत्यंत स्पष्ट अभिव्यक्ति मिली जो लंबे समय से उनके विचार में था। मुस्लिम मित्रता ने द्वार खोला, पर खोज की जगह नहीं ली; व्यापक अध्ययन और तुलना व्यक्तिगत विश्वास में बदले।
उनके मूल साक्षात्कार इस्लाम स्वीकार करने की आयु अठारह वर्ष बताते हैं, पर शहादा का दिन या महीना प्रकाशित नहीं करते। जिस दिन वे मुस्लिम हुईं, उसी दिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिजाब पहनना भी शुरू किया। उन्होंने इसे अपनी समझ के अनुरूप बताया, साथ ही माना कि यह आसान नहीं था और आगे बहुत कुछ सीखना था।
आरंभ में वे इबादत के विषय में अपने साथ अत्यधिक कठोर थीं, मानो सामने कर्तव्यों की लंबी सूची हो जिसमें असफल होने का भय हो। समय के साथ उन्होंने समझा कि इबादत क्यों की जाती है और कर्तव्य, काम तथा दैनिक जीवन में संतुलन कैसे बने। उनके वर्णन में अभ्यास भय से किए गए कर्मों से अर्थपूर्ण उपासना बना।
परिवार ने उनका साथ दिया और अधिकांश निकट मित्र बने रहे, यद्यपि कुछ संबंध बदल गए। उन्होंने एक समय ऐसे वस्त्रों की नकल भी की जो उनके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाते थे, क्योंकि उन्हें वही एक विकल्प लगा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कलात्मक आवाज़ फिर पाई और सौंदर्य व स्वतंत्र चुनाव पर आधारित शालीन वस्त्र बनाए।
उनकी यात्रा दिखाती है कि नई धार्मिक पहचान को अतीत या व्यक्तित्व मिटाने की आवश्यकता नहीं। ज्ञान की शुरुआत मित्र या पुस्तक से हो सकती है, पर विश्वास विचारों की परीक्षा और प्रमाण पढ़ने से परिपक्व होता है। निर्णय के बाद नए मुसलमान को ऐसी क्रमिक शिक्षा चाहिए जो इबादत को अर्थ से जोड़े और उसे उधार का रूप नहीं, सच्चा जीवन बनाने की जगह दे।
