बाबा अली: जब पिता की बीमारी ने सत्य की खोज को टालना असंभव बना दिया

अली अर्देकानी, जिन्हें बाद में बाबा अली के नाम से जाना गया, बताते हैं कि उनका पालन-पोषण ऐसे धर्मनिरपेक्ष घर में हुआ जहाँ किसी खास धर्म का अभ्यास नहीं था। पढ़ाई में सफलता महत्त्वपूर्ण थी, पर परलोक का प्रश्न रोज़मर्रा की शिक्षा का हिस्सा नहीं था। लगभग अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने सृष्टिकर्ता और जीवन के उद्देश्य की खोज शुरू की। कुछ समय वे विक्का से जुड़े और पत्थरों में लाभ की शक्ति देखने लगे; फिर उन्हें लगा कि जो वस्तु स्वयं को नहीं बचा सकती, वह मनुष्य का सहारा कैसे बनेगी। यही विचार उन्हें सृष्टि से सृष्टिकर्ता की ओर प्रश्न करने ले गया।
उन्होंने अपने लिए एक कसौटी रखी: यदि सृष्टिकर्ता पूर्ण है, तो उसकी ओर से होने का दावा करने वाला मार्ग जाँच को सह सके। उन्होंने धर्मों और ग्रंथों की तुलना की—किसने ग्रंथ पहुँचाया, क्या उसमें बदलाव हुआ, किसी दूसरे के पाप का भार कौन उठाता है, और प्रकाशना तथा स्थापित विज्ञान का संबंध क्या है। ये उनकी अपनी दिनांकित गवाही में दर्ज प्रश्न हैं; इन्हें दूसरे धर्मों के लोगों पर सामूहिक निर्णय या स्मृति से गढ़े गए शब्दशः संवाद के रूप में नहीं लिखा जा सकता।
खोज तब अत्यावश्यक हो गई जब उनके पिता को हृदयाघात हुआ और ट्रिपल-बायपास सर्जरी की तैयारी हुई। अर्देकानी इस्लाम को समझने के लिए एक शीतकालीन शिविर जाने वाले थे; परिवार चाहता था कि वे अस्पताल में रहें, क्योंकि पिता की जान को खतरा था। अस्पताल में बैठकर उन्हें लगा कि मृत्यु केवल बूढ़ों की प्रतीक्षा नहीं करती—वे स्वयं पिता से पहले भी मर सकते हैं। यदि सत्य का प्रश्न टालते रहे, तो शायद उत्तर खोजने का समय ही न बचे। वे बहुत कम जानकारी के साथ शिविर गए।
शिविर में अलग-अलग नस्लीय और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों की सहज मित्रता ने उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने इसे जन्म से मिले रंग या राष्ट्रीयता के बजाय चुने हुए विश्वासों का बंधन समझा। आगे की जाँच में कई बातें उनके लिए एक चित्र में जुड़ीं: ईश्वर की एकता, अपने कर्मों की व्यक्तिगत जवाबदेही, कुरआन के संरक्षण की उनकी समझ, स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों से संगति, और इबादत तथा नैतिकता की स्पष्टता।
वे कहते हैं कि उन्होंने पहले ही निश्चय किया था कि सत्य मिल जाए तो इच्छा की कीमत पर भी उसका अनुसरण करेंगे। इस्लाम को सत्य मानने के बाद उन्होंने विवाह के बाहर के संबंध, मित्रों के साथ की कुछ आदतों और सांस्कृतिक गर्व को दोबारा देखा। साक्षात्कार सामान्य रूप से शहादा की व्याख्या करता है, पर उनकी अपनी घोषणा का दिन, स्थान, गवाह या सटीक शब्द नहीं देता; इसलिए कोई दृश्य नहीं गढ़ा जाता।
दिनांकित साक्षात्कार में वे निर्णय के बाद जिम्मेदारी को पति-पत्नी और बच्चों के अधिकार, माता-पिता के सम्मान और सामान्य मनोरंजन के लिए धार्मिक सीमाओं से जोड़ते हैं। बाद की सार्वजनिक सामग्री में लघु फ़िल्मों, खेलों और विवाह परियोजना का उल्लेख है, और यह बात भी कि इस्लाम को कुछ मुसलमानों की गलत प्रथाओं से अलग समझना चाहिए। ये अपने समय की सार्वजनिक गतिविधियाँ हैं; उनसे आज की निजी धार्मिक स्थिति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
यह यात्रा तीन उपयोगी प्रश्न छोड़ती है: मृत्यु का बोध भय का शोषण किए बिना खोज कैसे जगा सकता है? मित्रता प्रमाण का स्थान लिए बिना धार्मिक दावों की तुलना में कैसे सहायक हो सकती है? और एकेश्वरवाद संबंधों व काम में जिम्मेदारी कैसे बनता है? उनके संदेश का केंद्र है—विरासत में मिली धारणा का अंधा अनुसरण न करें, खोज को ऐसे न टालें मानो मृत्यु भी टल जाएगी, और केवल मीडिया की छवि पर निर्भर न रहें।
स्रोत
- Digital Mimbar / The Deen Show — Why Baba Ali accepted ISLAM? (direct recorded interview, 11 June 2009)
- The Religion of Islam — Baba Ali, Ex-Atheist, USA (timestamped testimony map, 16 September 2014)
- Productive Muslim — Interview with Productive Muslim: Baba Ali (full direct transcript, 5 December 2010)
- The New York Times — Young Video Makers Try to Alter Islam's Face (independent profile, 8 May 2008)
- AltMuslim / Patheos — Video blogger Baba Ali: I'm not a scholar, I just try to tell people simple things
