क्रेग ‘इस्माइल’ फेंटर: पादरी जीवन से उस राह तक जिसे उन्होंने इस्लाम से जुड़ा पाया

क्रेग विक्टर फेंटर अमेरिका के एक कैथोलिक परिवार में पले-बढ़े। वे सेमिनरी में गए और अपने कथन के अनुसार लगभग दस वर्ष पादरी और धर्म-शिक्षक रहे। धार्मिक अभ्यास और अध्ययन के बावजूद सिद्धांत से जुड़े प्रश्न और आध्यात्मिक खालीपन उनके साथ बने रहे। अंततः उन्होंने पादरी पद और चर्च छोड़ दिया। संगीत ने उन्हें नया काम दिया, लेकिन उनके अनुसार खोज समाप्त नहीं हुई।
सन् 2004 में सैन फ़्रांसिस्को में उनकी मुलाक़ात जलालुद्दीन रूमी की वंशज एसिन चेलेबी बायरू से हुई। फेंटर ने बाद में याद किया कि उन्होंने अपनी हालत समुद्र की तह में पहुँच चुके व्यक्ति जैसी बताई थी। अनादोलू एजेंसी में प्रकाशित उनकी स्मृति के अनुसार, बायरू ने कहा कि खोजते रहने का अर्थ है कि ख़ज़ाने की शुरुआत मिल चुकी है, और उन्हें कोन्या बुलाया। यह बाद में याद किया गया संवाद है, उस समय की रिकॉर्डिंग नहीं।
दिसंबर 2005 में वे कोन्या गए, शब-ए-अरूस कार्यक्रमों में शामिल हुए और मेवलाना संग्रहालय देखा। फेंटर उस यात्रा से एक गहरे निजी अनुभव को जोड़ते हैं, पर उनकी कहानी केवल भावना पर नहीं रुकी। उन्होंने नादिर कार्निब्यूक से सीखना शुरू किया और क़ुरआन की आयतें तथा दुआएँ रिकॉर्ड कीं ताकि उन्हें याद और समझ सकें।
उनके सामने निर्णायक प्रश्न यह था कि रूमी की कविता में आकर्षित करने वाली राह इस्लाम से अलग है या उसी की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि अंततः वे समझे कि रूमी की राह पैग़म्बर मुहम्मद की राह है। इस तरह एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण, उनके कथन में, एकेश्वरवाद और पैग़म्बरी की स्वीकृति बना। उन्होंने 2006 में इस्लाम स्वीकार किया और इस्माइल नाम अपनाया।
इसके बाद वे हर वर्ष कोन्या लौटे और बाद में वहीं बस गए। फ़रवरी 2026 में BBC World Service की रिपोर्टर एमिली विदर ने कोन्या में उनसे मुलाक़ात की। स्वतंत्र कार्यक्रम ने उनके व्यापक सफ़र की पुष्टि की—एक पूर्व ईसाई धर्मगुरु के आध्यात्मिक खालीपन से, रूमी की कविता और खोज के रास्ते, इस्लाम और मेवलेवी समुदाय तक। फिर भी यह शहादा की कोई निश्चित तारीख़ नहीं देता।
उनकी कहानी यह सिद्ध नहीं करती कि साहित्यिक आकर्षण या कोई गहरा आध्यात्मिक अनुभव अपने आप में ईमान का निर्णय लेने के लिए पर्याप्त है। इसका महत्व उस यात्रा में है जिसे वे आकर्षण से अध्ययन और प्रश्न से समझ तक बताते हैं। शहादा का दिन, स्थान और गवाह सार्वजनिक नहीं हैं; उन्हें अनुमान से नहीं भरा जाना चाहिए।
फेंटर के वर्णन में यह यात्रा एक ऐसी धार्मिक संस्था से शुरू हुई जिसे वे वर्षों से जानते थे, फिर उस खोज तक पहुँची जो खालीपन से संतुष्ट नहीं हुई, और अंत में अध्ययन व निर्णय तक। निर्णायक बात केवल कोन्या की यात्रा नहीं थी, बल्कि यह समझ थी कि रूमी में उन्हें प्रिय राह एकेश्वरवाद और पैग़म्बर मुहम्मद के अनुसरण की ओर लौटती है।
