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एरिक श्रोडी ‘एवरलास्ट’: एक परिवार की मिसाल और इस्लाम तक ले जाने वाले प्रश्न

गर्म रोशनी में कालीन पर रखी बंद क़ुरआन
Malik Shibly / Unsplash — source · license.

बिना दबाव की मिसाल

एरिक श्रोडी, जो एवरलास्ट नाम से प्रसिद्ध हैं, अमेरिका के एक कैथोलिक परिवार में पले। उनके अनुसार इस्लाम से परिचय किसी मनाने के प्रयास से शुरू नहीं हुआ, बल्कि मुस्लिम बशीर परिवार से लंबे संबंध के माध्यम से हुआ। उस परिवार के जीवन ने उनका ध्यान खींचा, खासकर इसलिए कि उनकी स्मृति में उन्होंने धर्म बदलने का कोई दबाव नहीं डाला।

1980 के दशक के अंतिम वर्षों में उन्होंने किसी दूसरे व्यक्ति को इस्लाम स्वीकार करते देखा। तब उनकी धारणा थी कि इस्लाम केवल एक नस्ली समुदाय से जुड़ा है; भिन्न पृष्ठभूमि के व्यक्ति का यह निर्णय देखकर उन्होंने उस धारणा पर प्रश्न किया। मित्रताओं ने फिर उन्हें विरासत में मिली छवि पर निर्भर रहने के बजाय पूछने और सुनने का अवसर दिया।

तुलना का द्वार खोलने वाले प्रश्न

बाद में उनके बताए अनुसार उनकी खोज ईश्वर की एकता और इस्लाम में ईसा की स्थिति पर केंद्रित थी। उन्होंने जाना कि इस्लाम ईसा को पैग़म्बर और संदेशवाहक मानता है, ईश्वर नहीं; इसे उन्होंने पैग़म्बरी संदेशों की निरंतरता के रूप में समझा। मूसा, ईसा और मुहम्मद को जोड़ने वाली क्रमिक प्रकाशना की धारणा भी उनके लिए महत्वपूर्ण हुई।

विश्वास किसी एक सूचना पर नहीं टिका। परिवार की मिसाल के साथ सृष्टिकर्ता, पैग़म्बरी और उतारी गई किताबों के प्रश्न जुड़े; पढ़ने, सुनने और बातचीत ने खोज को निजी निर्णय तक पहुँचाया। उनके वृत्तांत में न सामाजिक दबाव इसका कारण है, न कोई एक व्यक्ति—यह वर्षों में विकसित हुई प्रक्रिया थी।

दो चरणों में लिया गया निर्णय

पूर्ण साक्षात्कार बताता है कि सुनने और पढ़ने के बाद उन्होंने पहली बार शहादा कहा, फिर कुछ समय तक सीखी बातों पर स्थिर नहीं रह सके और बाद में अपनी प्रतिबद्धता नवीकृत की। यह संस्करण दोनों चरण अलग रखता है; उन्हें एक दृश्य में नहीं मिलाता और स्रोतों में न आए स्थान, गवाह या संवाद नहीं जोड़ता।

मूलतः 2001 के एक दूसरे प्रत्यक्ष साक्षात्कार में श्रोडी ने साफ कहा कि उन्होंने 1996 में शहादा कहा था। इसलिए कहानी केवल वर्ष रखती है। दिन, महीना, स्थान, विस्तृत शब्द और गवाह अज्ञात हैं; बाद की रिपोर्टों के अनुमानित वाक्यों से उन्हें बनाया नहीं जा सकता।

धीरे-धीरे सीखा गया आचरण

निर्णय के बाद उन्होंने नमाज़ सीखने को क्रमिक यात्रा बताया—कम से आरंभ कर समय के साथ अभ्यास बढ़ाना। उनका वृत्तांत इसे सीखने की प्रक्रिया के रूप में रखता है, तत्काल पूर्णता के रूप में नहीं। उन्होंने उस समय रोज़े और परिवार द्वारा उनके चुनाव को स्वीकार किए जाने की भी बात की।

1999 की शुरुआत में प्रकाशित दो स्वतंत्र प्रोफाइल उनके ऐतिहासिक धर्म-परिवर्तन के सार्वजनिक तथ्य की पुष्टि करती हैं और प्रक्रिया को निजी तथा धीमी बताती हैं। कहानी इसी सीमा में रहती है: शांत मिसाल ने प्रश्न जगाए, एक ईश्वर और पैग़म्बरी की खोज ने 1996 के निर्णय तक पहुँचाया, और उसके बाद सीखना जारी रहा—आज की धार्मिक स्थिति पर कोई दावा किए बिना।

स्रोत

  1. Adisa Banjoko — complete two-part direct interview (2006)
  2. Osmanische Herberge — 2001 direct interview, German original and English translation
  3. Los Angeles Times — independent profile (10 January 1999)
  4. The Washington Post — independent profile (14 February 1999)

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