हादिया: जब आस्था का प्रश्न अपने निर्णय के अधिकार से जुड़ गया

जब एक वयस्क स्त्री का निर्णय उसके माता-पिता को स्वीकार न हो और उसका जीवन अदालत तक पहुँच जाए, तब उस निर्णय का अधिकार किसके पास है? हादिया के लिए आस्था केवल दिल और ईश्वर के बीच का मामला नहीं रह सकी। उनका नाम, पहनावा, पढ़ाई और विवाह वर्षों तक सार्वजनिक विवाद का विषय बने रहे। इस सबके बीच वह एक बात दोहराती रहीं: इस्लाम उन्होंने अपनी इच्छा से चुना था।
उनका पहले का नाम अखिला अशोकन था और वे माँ के हिंदू धर्म का पालन करती थीं। 2018 के हलफ़नामे में उन्होंने कहा कि बचपन में इस्लाम उनके लिए अनजान था। 2010 में सलेम के होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के बाद उनकी मुस्लिम छात्राओं से मित्रता हुई। उनके अच्छे व्यवहार ने सवाल जगाए, फिर उन्होंने इस्लाम पर किताबें पढ़ीं। उनके अनुसार रोज़मर्रा की मित्रता अध्ययन और निजी चुनाव की शुरुआत बनी।
विवाह से पहले लिया गया निर्णय
हादिया ने इस्लाम स्वीकार करने का अपना निर्णय 2013 का बताया। उन्होंने कहा कि वे नमाज़ पढ़ने लगीं, लेकिन पिता के विरोध के बाद घर में अपनी आस्था छिपाने लगीं। जनवरी 2016 में उन्होंने धर्म-परिवर्तन की औपचारिक मान्यता और आगे इस्लामी शिक्षा का प्रयास किया। शफीन जहां से विवाह 19 दिसंबर 2016 को हुआ, उनके बताए धार्मिक निर्णय के कई वर्ष बाद।
यह क्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि सार्वजनिक बहस ने दोनों निर्णयों को अक्सर एक बना दिया। सर्वोच्च न्यायालय में दिए हलफ़नामे में हादिया ने उन्हें अलग रखा: इस्लाम को उन्होंने अध्ययन के बाद चुना और पति को बाद में अपनी इच्छा से चुना। विवाह उनकी आस्था का कारण नहीं था, और उन्होंने दूसरों की कथाओं को अपनी आवाज़ की जगह लेने से इनकार किया।
जब उनकी आवाज़ ही विवाद बन गई
पिता ने उनके निर्णय का विरोध किया और मामला अदालतों तक पहुँचा। मई 2017 में केरल उच्च न्यायालय ने विवाह को रद्द कर उन्हें माता-पिता के घर भेज दिया। नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश होने तक वह पुलिस निगरानी में वहीं रहीं।
दिल्ली जाने से पहले कोच्चि हवाई अड्डे पर उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे अपनी इच्छा से मुसलमान बनी हैं और किसी ने मजबूर नहीं किया। 27 नवंबर 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बात सुनी। वे सलेम के कॉलेज लौटकर अपनी इंटर्नशिप पूरी करना चाहती थीं। अदालत ने वापसी की व्यवस्था और छात्रावास में अन्य छात्राओं जैसा व्यवहार करने का निर्देश दिया। विवाद के बीच पढ़ाई पूरी करना उनकी स्पष्ट इच्छा बनी रही।
बाद के हलफ़नामे में उन्होंने फिर कहा कि धर्म और विवाह दोनों उनके अपने फैसले थे। उन्होंने यह भी नकारा कि इस्लाम ने उन्हें माता-पिता से काट दिया है। उनके अनुसार आस्था में माता-पिता का अधिकार बहुत बड़ा है, लेकिन वह ऐसे घर नहीं लौट सकती थीं जहाँ अपनी आस्था छोड़ना शर्त हो।
अदालत का निर्णय और हादिया की आवाज़
8 मार्च 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने विवाह रद्द करने वाला आदेश हटा दिया। 9 अप्रैल को जारी कारणों में उसने बताया कि उनकी हिरासत से संबंधित कार्यवाही में एक वयस्क महिला का विवाह रद्द करके केरल उच्च न्यायालय ने उस कार्यवाही की सीमा पार की थी। साथ ही, आपराधिक मामलों की जाँच कानून के अनुसार जारी रह सकती थी। विवाह पर निर्णय विवाद के हर आरोप का फैसला नहीं था।
मामले के दस्तावेज़ उनके चुनाव के बाद के जीवन का एक हिस्सा दिखाते हैं: नमाज़, सीखना, पढ़ाई पूरी करने की इच्छा और मतभेद के बावजूद माता-पिता से संबंध बनाए रखने का प्रयास। ये हादिया की अपनी व्यक्त इच्छाएँ थीं। इन्हीं से उनके नाम वाले मुकदमे के पीछे का व्यक्ति स्पष्ट होता है।
स्रोत
- हादिया का हलफ़नामा, 19 फ़रवरी 2018, पृष्ठ 3–5
- The Indian Express — सर्वोच्च न्यायालय में हादिया के हलफ़नामे के अंश, 20 फ़रवरी 2018
- The Indian Express — हादिया का सार्वजनिक बयान, 26 नवंबर 2017
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय — 8 मार्च का आदेश और 9 अप्रैल 2018 के कारण
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