हमज़ा त्ज़ोर्त्ज़िस: जब सवाल जीने का तरीका बन गया

आंद्रेयस त्ज़ोर्त्ज़िस लंदन में ऐसे सवालों के बीच बड़े हुए जिन्हें उनके पिता गंभीरता से लेते थे: जीवन का अर्थ क्या है और मनुष्य उसमें अपनी जगह कैसे समझे? घर में किताबें और तरह-तरह के विचार मौजूद थे। हमज़ा ने बाद में बताया कि इस वातावरण ने उनकी खोज को कैसे प्रभावित किया। उनके माता-पिता की पृष्ठभूमि यूनानी थी। घर में ईश्वर और जीवन के अर्थ में रुचि थी, लेकिन चर्च के धार्मिक आचरण को जीवन का केंद्र नहीं बनाया गया था।
स्कूल में उनके अलग-अलग पृष्ठभूमियों वाले मुस्लिम मित्र बने। अपने विश्वास पर उनका भरोसा और जातीय सीमाओं से आगे बढ़ती मित्रता उन्हें आकर्षित करती थी। सवाल बढ़े तो उन्होंने बौद्ध धर्म सहित विभिन्न धर्मों के बारे में पढ़ा और इस्लाम को भी समझने लगे। पेशा चुनने या सफलता पाने के साथ उनके लिए यह समझना ज़रूरी था कि वे जी क्यों रहे हैं।
खोज के दौरान वह बौद्धिक रूप से इस्लाम के प्रति आश्वस्त हुए, लेकिन उन्होंने अपनी जानकारी और उसके भीतर उतरने के बीच एक दूरी महसूस की। औपचारिक रूप से इस्लाम स्वीकार करने से पहले उन्होंने क़ुरआन के कुछ अंश अरबी में सीखने और रोज़ की कुछ नमाज़ें पढ़ने की शुरुआत की। उनके भाई के एक मित्र ने सजदे में अल्लाह के निकट होने की बात कही थी। वह सलाह उनके साथ रही और उन्होंने नमाज़ में मार्गदर्शन माँगना शुरू किया।
स्कूल के एक पुराने मित्र के साथ बातचीत भी जारी रही। अपनी पुस्तक द डिवाइन रियलिटी की भूमिका में उन्होंने 4 अक्टूबर 2002 की शाम कार में हुई एक बातचीत याद की। विषय था मृत्यु और जीवन का छोटा होना। उन्हें ठीक-ठीक शब्द याद नहीं थे, लेकिन उनका प्रभाव याद था: जो बात वे समझते थे, वह भीतर उतरने लगी और जीवन बदलने का निर्णय अब टालते रहना उचित नहीं लगा।
अगली सुबह, 5 अक्टूबर 2002 को वह लंदन सेंट्रल मॉस्क गए और इस्लाम स्वीकार किया। इस कदम से पहले अध्ययन, अभ्यास और संवाद हो चुके थे। शुरुआती महीनों को याद करते हुए उन्होंने फ़ज्र की नमाज़ के लिए मस्जिद जाने के महत्व का ज़िक्र किया। पढ़ी हुई बातों को अब दिन में एक समय और दूसरों के साथ की जाने वाली इबादत का रूप मिला था।
निर्णय के बाद भी आत्मचिंतन की ज़रूरत बनी रही। उन्होंने परिवार के साथ शुरुआती कठिनाइयों का वर्णन किया, फिर अधिक खुले संबंध और माता-पिता की सेवा व अच्छे व्यवहार के महत्व पर बात की। इस्लाम को समझाने के शुरुआती प्रयासों में उन्होंने अपनी गलतियाँ भी स्वीकार कीं और कुछ तर्कों में सुधार की ज़रूरत मानी। दर्शन का अध्ययन, लेखन और अलग विचार रखने वालों से संवाद उनकी खोज का हिस्सा बने रहे।
उनकी यात्रा बौद्धिक सवालों को इबादत से और शुरुआती उत्साह को गलतियों से सीखने से जोड़ती है। इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी वह अपने समझने, बोलने और दूसरों से व्यवहार करने के तरीके को परखते रहे। यह यात्रा पाठक से पूछती है: जिस ज्ञान को हम सही मानते हैं, जब वह रोज़मर्रा के जीवन का तरीका बनता है, तो क्या बदलता है?
स्रोत
- Hamza Andreas Tzortzis — The Divine Reality, Preface: My Journey
- Towards Eternity — Interview with Hamza Tzortzis
- İLKHA — Interview with Hamza Tzortzis
- University of Birmingham — Online Islamic Dawah Narratives in the UK, 2017, pp. 61–67
- Sapience Institute — The Divine Reality: book and author information
