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जोनाथन ब्राउन: जब आस्था को समझने की भाषा मिली

गर्म रोशनी में कालीन पर रखा बंद कुरआन
चित्र: Qur’an still life — Malik Shibly / Unsplash (Unsplash लाइसेंस).

जोनाथन ब्राउन बचपन से ईश्वर में विश्वास करते थे, फिर भी सुविधापूर्ण जीवन ने उन्हें उसके अर्थ का स्थिर उत्तर नहीं दिया था। वॉशिंगटन में एंग्लिकन पृष्ठभूमि वाले एक अमेरिकी परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। निजी स्कूलों के बाद वे कैलिफ़ोर्निया के एक आवासीय विद्यालय गए। अपने व्यक्तिगत विवरण में उन्होंने बताया कि दूसरी संस्कृतियों और धर्मों के लोगों के जीवन से वे बहुत परिचित नहीं थे। उन्हें लगता था कि पढ़ाई और क्षणिक सुखों से जीवन की उनकी पूरी तलाश व्यक्त नहीं होती।

जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के पहले वर्ष में धर्मशास्त्र की अनिवार्य पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्होंने इस्लाम का एक पाठ्यक्रम चुना। उसे एक मुस्लिम महिला पढ़ाती थीं। वे इस्लाम को हिंसा से जोड़ने वाली धारणाएँ लेकर कक्षा में पहुँचे और अपनी अध्यापिका से बहस भी की। लेकिन पूरे सेमेस्टर सुनते रहने से उनके सामने ऐसी समझ आई जिसे वे पहले नहीं जानते थे: एक ईश्वर में विश्वास, और ऐसा धर्म जिसमें उनकी समझ के अनुसार तर्क को छोड़ना आवश्यक नहीं था।

2010 के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ईश्वर तथा तर्क और धर्म के संबंध के बारे में सुनी बातों का मेल उनकी पुरानी धारणाओं से था। 1997 की गर्मियों में उन्होंने इस्लाम पर पढ़ना जारी रखा। दूसरे वर्ष की शुरुआत में विश्वविद्यालय लौटते समय उनका निर्णय हो चुका था। अपने विवरण में वे बताते हैं कि धर्म को जानने के दौरान मिले मुस्लिम मित्रों के सामने उन्होंने शहादा पढ़ा और नमाज़ शुरू की।

इस प्रतिबद्धता का व्यावहारिक रूप भी था। उन्होंने शराब छोड़ने की बात कही और बताया कि परिवार धीरे-धीरे उनके बदलाव को समझने लगा तथा साथ देता रहा। उन्होंने इस्लाम की पढ़ाई जारी रखी, मध्य पूर्व के इतिहास की ओर बढ़े और शोध को अपनी क्षमताओं के अनुकूल काम समझा। कक्षा में उठा प्रश्न एक लंबी बौद्धिक यात्रा का हिस्सा बन गया; वह केवल सेमेस्टर के अंत तक सीमित नहीं रहा।

सीखने के साथ नए प्रश्न भी सामने आए: धर्म कहाँ समाप्त होता है और सांस्कृतिक रिवाज कहाँ शुरू होते हैं? अमेरिका में मुस्लिम होकर जीने का क्या अर्थ है? 2015 में WUOT रेडियो से बातचीत के समय उन्होंने इन प्रश्नों पर चर्चा की। तब वे जॉर्जटाउन के प्राध्यापक और इस्लामी अध्ययन के लेखक थे। मुस्लिम बनने से समझने की ज़रूरत समाप्त नहीं हुई; जाँचने और सीखने की ज़िम्मेदारी बढ़ी।

इस यात्रा में विश्वास और आचरण साथ चलते हैं: जानकारी ने पुरानी छवि बदली, पढ़ना निर्णय से पहले आया, और फिर उपासना तथा अध्ययन जारी रहे। अपने शुरुआती आकर्षण को समझाते हुए ब्राउन ईश्वर की अपनी समझ और आस्था व तर्क के सामंजस्य की ओर लौटते थे। उनकी कहानी खोज करने वाले पाठक के सामने एक प्रश्न रखती है: किसी विचार पर पहले से निर्णय कर लेने के बाद, उसे सचमुच समझने का अवसर दें तो क्या बदल सकता है?

स्रोत

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