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इब्राहीम रिचमंड: फिर से प्रश्न करने का साहस

طريق ترابي يمتد نحو جبل في جنوب أفريقيا

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जब उन्होंने इस्लाम को जाना

इब्राहीम रिचमंड दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलु-नटाल में एक स्थानीय कोरिंथियन चर्च समुदाय का नेतृत्व करते थे। लगभग पंद्रह वर्षों तक उन्होंने लोगों से धर्म की बात की और अंग्रेज़ी तथा ज़ुलु के बीच अनुवाद किया। उनके वर्णन का यह चर्च मुख्यधारा के ईसाई संप्रदायों की साधारण प्रतिलिपि नहीं था। रिचमंड के अनुसार, उसके सदस्य एक ईश्वर को मानते थे, यीशु को अंतिम पैगंबर समझते थे, सूअर का मांस नहीं खाते थे और उपासना के समय जूते उतारते थे। धर्म उनके जीवन के केंद्र में था, फिर भी इस्लाम से उनका परिचय बहुत सीमित था।

चर्च के प्रतीक में चाँद और तारा भी थे। रिचमंड ने बाद में बताया कि उनके दादा अब्देल मुसलमान थे और चर्च की स्थापना करने वाले उनके पिता योहानेस ने यह निशान बनाए रखा था। लेकिन प्रतीक की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं था कि समुदाय कुरआन या मुहम्मद के संदेश को जानता था। बाद की एक बातचीत में रिचमंड ने साफ़ कहा कि वे दोनों से अपरिचित थे। निशान सामने था, जबकि वह अर्थ जिससे रिचमंड ने उसे बाद में जोड़ा, अभी उनसे दूर था।

रिचमंड ने अपनी यात्रा के अंतिम चरण की शुरुआत चर्च में सोते समय बार-बार आने वाले एक स्वप्न से जोड़ी। उनके अनुसार, स्वप्न में एक आवाज़ ने उनसे समुदाय के लोगों को सफ़ेद कपड़े पहनने के लिए कहने को कहा। उन्होंने यह अनुभव लोगों को बताया और कुछ ने सफ़ेद कपड़ों को मुसलमानों से जोड़ा। प्रकाशित दोनों साक्षात्कार इस बात पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि स्वप्न कितनी बार आया, पर दोनों बताते हैं कि उन्होंने इसे समुदाय से साझा किया और लोगों ने उनका अनुरोध स्वीकार किया।

7 अप्रैल 2023 को, जब रिचमंड चर्च की एक सभा की तैयारी कर रहे थे, एक पादरी ने उन्हें बताया कि कुछ मुस्लिम आगंतुक आए हैं। चार पुरुषों ने चाँद-तारे का निशान देखा था और वे जानना चाहते थे कि वह वहाँ क्यों था। रिचमंड ने कहा कि उनके सफ़ेद कपड़ों ने उन्हें अपने स्वप्न की याद दिलाई। उन्होंने उनका स्वागत किया और शाम को वापस आकर एकत्र लोगों से बात करने का निमंत्रण दिया।

आगंतुक लौटे तो रिचमंड केवल स्वप्न या संयोग से जोड़े अपने अर्थ पर नहीं रुके। उन्होंने प्रश्न किया: कोई व्यक्ति मुसलमान कैसे बनता है? आगंतुकों ने केवल ईश्वर के प्रति समर्पण, ईश्वर की एकता, मुहम्मद के संदेश और आस्था की गवाही का अर्थ समझाया। इस उत्तर ने उन्हें उस आस्था का सीधा परिचय दिया जो उसके कुछ प्रतीकों के लंबे समय से आसपास होने के बावजूद उनसे अपरिचित थी।

इसके बाद रिचमंड ने वह विश्वास बताया जिसने निर्णय को आकार दिया: वे मुसलमान बनना और अनेक देवताओं के बजाय केवल अल्लाह की उपासना करना चाहते थे। जिस अनुभव ने पहले उनका ध्यान खींचा था, अब उसके साथ एक स्पष्ट धार्मिक उत्तर जुड़ गया था। उनके अपने कथन में स्वप्न अकेला निर्णायक कारण नहीं था। निर्णय के समय उन्होंने इस्लाम का अर्थ पूछा, समर्पण और शहादा की व्याख्या सुनी और केवल एक ईश्वर की उपासना को चुना।

आगंतुकों ने उनसे आस्था की गवाही अपने समुदाय को समझाने को कहा। रिचमंड ने अंग्रेज़ी और ज़ुलु में ऐसा किया और फिर स्वयं उसे पढ़ा; अनेक उपस्थित लोगों ने उनका साथ दिया। दोनों रिपोर्टें भीड़ के बारे में अलग-अलग अनुमान देती हैं: एक उस शाम अपेक्षित कई हज़ार लोगों का उल्लेख करती है, जबकि दूसरी लगभग पंद्रह सौ लोगों के शहादा पढ़ने की बात कहती है। इतना स्पष्ट है कि रिचमंड ने एक बड़ी सभा के सामने अपने विश्वास की घोषणा की और उनके कथन तथा बाद की रिपोर्टों के अनुसार बहुत से लोग उसमें शामिल हुए।

चर्च की यह पृष्ठभूमि उनके निर्णय को केवल धार्मिक नाम बदल लेने से अधिक जटिल बनाती है। रिचमंड ने कहा कि उनका समुदाय पहले भी एक ईश्वर की बात करता और कुछ मुस्लिम प्रथाओं से मिलती-जुलती आदतें निभाता था, फिर भी वह कुरआन और मुहम्मद के पैगंबर होने को नहीं जानता था। बाद में उन्होंने इस दूरी को उन बाधाओं से जोड़ा जो रंगभेद ने मुस्लिम और अफ्रीकी समुदायों के बीच खड़ी की थीं। यह रिचमंड की ऐतिहासिक व्याख्या है, दक्षिण अफ्रीका का संपूर्ण इतिहास नहीं; फिर भी यह दिखाती है कि परिचित प्रतीक या कुछ समानताएँ प्रत्यक्ष ज्ञान की जगह नहीं ले सकतीं।

इस्लाम स्वीकार करने के बाद रिचमंड ने खुशी और राहत की बात कही और कुरआन तथा पैगंबर की सुन्नत का अनुसरण करने का इरादा व्यक्त किया। उन्होंने अपने चुनाव के कारण किसी उत्पीड़न का दावा नहीं किया। इसके विपरीत, उनका कहना था कि उन्हें नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, और उन्होंने रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ्रीकी संविधान में मिली धार्मिक स्वतंत्रता की ओर संकेत किया। अधिक स्पष्ट चुनौती हर सार्वजनिक शुरुआत के बाद आने वाला काम था: उस आस्था को सीखना जिससे उनका परिचय नया था और साथ आने वालों तक भरोसेमंद ज्ञान पहुँचाना।

यह आवश्यकता बाद में अंग्रेज़ी और ज़ुलु में कुरआन के अनुवाद तथा नए मुसलमानों के लिए परिचयात्मक पुस्तकों के वितरण में दिखाई दी। रिचमंड धार्मिक और परोपकारी समूहों के कार्य से भी जुड़े। ये गतिविधियाँ यह प्रमाणित नहीं करतीं कि घोषणा की रात उपस्थित हर व्यक्ति का आगे का जीवन कैसा रहा या उसका आज का विश्वास क्या है। वे इतना अवश्य दिखाती हैं कि रिचमंड ने अपने निर्णय को क्षणिक घटना नहीं माना; उन्होंने उसे सीखने और लोगों की वास्तविक भाषाओं में धार्मिक ज्ञान उपलब्ध कराने से जोड़ा।

उनकी कहानी इस्लाम का परिचय कराने वालों और उसे समझने वालों, दोनों के सामने प्रश्न रखती है। कितने समुदाय मुसलमानों के पास रहते हैं, शायद ऐसा प्रतीक भी रखते हैं जिसे मुसलमान पहचानते हैं, फिर भी कुरआन से दूर हैं क्योंकि किसी ने उसे उनकी निकट भाषा में नहीं समझाया? और क्या कोई प्रभावशाली निजी अनुभव अपने आप में पर्याप्त है? रिचमंड के वर्णन में अनुभव ने दरवाज़ा खोला, लेकिन प्रश्न, व्याख्या और ईश्वर की एकता के अर्थ ने उनके घोषित चुनाव को आकार दिया।

इस यात्रा को अर्थपूर्ण होने के लिए रिपोर्टों में दी गई सबसे बड़ी संख्या की आवश्यकता नहीं है। उसका सबसे विश्वसनीय मानवीय चित्र एक धार्मिक नेता का है जो बोलने वाले की जगह से प्रश्न करने वाले की जगह पर आया। उसने एक सरल प्रश्न पूछा: कोई व्यक्ति मुसलमान कैसे बनता है? उसने ऐसा उत्तर सुना जिसका केंद्र केवल ईश्वर की उपासना और मुहम्मद को ईश्वर का संदेशवाहक मानना था, उसे चुना और अपने आसपास के लोगों को दो भाषाओं में समझाया। कोई गहरा अनुभव राह की ओर ध्यान दिला सकता है; ईमानदार प्रश्न, स्पष्ट ज्ञान और लगातार सीखना ही मनुष्य को उस राह पर चलने में सहारा देते हैं।

कहानी के केंद्र का प्रश्न

मनुष्य तब मुसलमान बनता है जब वह विश्वास करे कि केवल अल्लाह उपासना के योग्य है, मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, और सच्चे मन से कहे: अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन रसूलुल्लाह—मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना के योग्य नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। शहादत से पहले इस्लाम की हर शिक्षा जान लेना आवश्यक नहीं; सीखना वहीं से शुरू होकर जीवन भर चलता है।

स्रोत

इब्राहीम रिचमंड के साथ İLKHA के साक्षात्कार · अनादोलु एजेंसी के बाद के साक्षात्कार · वीडियो रिकॉर्डिंग

फ़ोटो: Michael Ali / Unsplash.