सारा जोसेफ़: जब सज्दा समर्पण का दिखाई देने वाला अर्थ बना

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जब उन्होंने इस्लाम को जाना
सारा जोसेफ़ ऐसे संसार में बड़ी हुईं जो बाहर से बहुत चमकीला दिखाई देता था। उनकी माँ वैलेरी एस्क्यू एक मॉडल एजेंसी चलाती थीं और अकेले पाँच बच्चों का पालन-पोषण भी करती थीं। सारा ने बाद में कहा कि जन्म के कुछ ही सप्ताह बाद से उनका बचपन एजेंसी के बीच बीता। उन्होंने सुंदरता और फैशन को पास से देखा, पर उनके पीछे का श्रम भी देखा। जब आसपास सब सुंदर दिखते हों, तब चेहरा प्रभावित करना छोड़ देता है; सारा लोगों को दूसरे प्रश्नों से परखने लगीं—क्या वे दयालु हैं, सच्चे हैं, और दूसरों की परवाह करते हैं?
इस्लाम से पहले वे धर्म का गंभीरता से पालन करने वाली रोमन कैथोलिक थीं। बचपन से उनमें गहरी आध्यात्मिक प्रवृत्ति और सामाजिक न्याय की चिंता थी। वे केवल भौतिक खालीपन भरने के लिए धर्म नहीं खोज रही थीं, और इस्लाम के बारे में भी बहुत कम जानती थीं। उनकी इच्छा थी कि जीवन ईश्वर को समर्पित हो, लेकिन विश्वास, करुणा और कर्म को एक सुसंगत मार्ग में जोड़ने वाली रूपरेखा अभी नहीं मिली थी।
द्वार एक ऐसे पारिवारिक प्रसंग से खुला जो पहले उनका अपना नहीं था। उनके भाई को एक मुस्लिम महिला से प्रेम हुआ और विवाह के लिए उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया। सारा को भाई के जीवन में कोई बड़ा धार्मिक परिवर्तन नहीं दिखा, पर उसी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। माँ ने बताया कि मुसलमान भी ईसा के कुँवारी मरयम से जन्म को मानते हैं। सारा ने विश्वास नहीं किया। बाद में पुस्तकालय में कुरआन मिला; उन्होंने सूचकांक में ईसा को खोजा और पाया कि माँ सही थीं।
इस एक तथ्य ने उन्हें तुरंत मुस्लिम नहीं बनाया। उसने एक निर्णायक शिक्षा दी: दूसरे धर्म की विरासत में मिली छवि, उस धर्म की अपनी बात से भिन्न हो सकती है। मूल स्रोत तक लौटना उनकी खोज का स्थायी तरीका बन गया।
इसी अवधि में कैथोलिक चर्च से उनका भरोसा टूट गया, पर ईश्वर में विश्वास नहीं टूटा। उनके अपने वर्णन में संकट विशेष रूप से पोप की अचूकता के ऐतिहासिक विकास की उनकी समझ, मूल पाप, क्रूस और इंजीलों के इतिहास से जुड़े प्रश्नों पर केंद्रित था। यह टूटन पीड़ादायक थी। वे उस समुदाय को हल्के में नहीं छोड़ रही थीं जिसमें उन्होंने उपासना की थी; लेकिन संस्था पर भरोसा समाप्त होने पर भी ईश्वर उनके मन से नहीं गए।
उन्होंने इस्लाम पढ़ना और प्रश्न करना जारी रखा। कुरआन में नबियों की एक सतत परंपरा ने उन्हें आकर्षित किया। आदम और हव्वा का साझा उत्तरदायित्व, दोनों की तौबा और ईश्वर की क्षमा—जिससे उनकी संतान कोई विरासत में मिला पाप नहीं उठाती—उन्हें अर्थपूर्ण लगा। नबियों की कथाओं में मनुष्य के सामने चुनाव और जिम्मेदारी रखे जाने ने भी उन्हें प्रभावित किया। ये अलग-अलग सूचनाएँ नहीं थीं; ये उस टूटे हुए पुराने ढाँचे से निकले प्रश्नों का उत्तर थीं: मनुष्य का ईश्वर से संबंध क्या है? न्याय, दया और तौबा साथ कैसे आते हैं?
सारा ने कहा कि वे प्रश्न करती रहीं और इस्लाम उत्तर देता रहा। उनकी केंद्रीय इच्छा वही थी—अपना जीवन ईश्वर को सौंप देना। फिर उन्होंने एक मुस्लिम लड़की को नमाज़ में सज्दा करते देखा। उन्होंने उस क्षण कोई भाषण या संवाद दर्ज नहीं किया। उनकी गवाही में बस इतना निश्चित है कि सज्दे ने पढ़े हुए अर्थ को दृश्य बना दिया: इस्लाम ईश्वर के सामने आत्मसमर्पण है। उसी बिंदु पर उन्होंने इस्लाम अपनाने का निर्णय किया।
उनकी आयु सोलह वर्ष थी। उपलब्ध स्रोत परिवर्तन को लगभग 1987–1988 के बीच रखते हैं, पर एक निश्चित वर्ष तय नहीं करते। उनकी कथा में भेद साफ है: उन्होंने भाई के दबाव या विवाह के लिए नहीं, बल्कि अपनी जाँच और ईश्वर की उपासना की पुरानी आकांक्षा के कारण निर्णय लिया।
निर्णय के बाद परीक्षा जल्दी आई। सिर ढकना परिवार को बहुत कठिन लगा। दादी को लगा कि वह विदेशी दिखाई देने लगी हैं; माँ को भय था कि बेटी ने महिला स्वतंत्रता छोड़ दी और भविष्य के अवसर बंद कर दिए। सारा ने इस चुनाव को प्रार्थना और महिला को केवल रूप तक सीमित करने के अपने पुराने विरोध से जोड़ा। 1988 में हिजाब शुरू करने पर उन्होंने पाया कि बहुत लोग उसे धर्म नहीं, नस्ल का चिह्न समझते थे। एक सामान्य श्वेत अंग्रेज़ लड़की अचानक नस्लवादी अपमान का निशाना बनी।
उन्होंने सत्रह वर्ष की उम्र में बाहरी व्यक्ति की तरह व्यवहार किए जाने का दर्द नहीं छिपाया, पर उसे कहानी का अंत भी नहीं बनने दिया। बाद में किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र और धार्मिक अध्ययन पढ़े और लेखिका, प्रसारक तथा व्याख्याता बनीं। 2004 में अंतरधार्मिक संवाद और महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्हें OBE मिला। 11 सितंबर के हमलों के बाद वे स्कूलों, विश्वविद्यालयों और उपासना-स्थलों में इस्लाम समझाने के लिए लगातार गईं; फिर उन्हें लगा कि मुसलमानों को केवल उन चीजों से परिभाषित करना जिनके वे विरोधी हैं, काम का सकारात्मक अर्थ समाप्त कर देता है।
इसीलिए उन्होंने अपने पति के साथ emel पत्रिका शुरू की—यह बताने के लिए कि उनके अनुसार इस्लाम किसके पक्ष में है: न्याय, सौंदर्य, मानव-सेवा और धरती की देखभाल। वे चाहती थीं कि धर्म घर, काम, संस्कृति और पर्यावरण में दिखाई दे, केवल राजनीति या अनुष्ठान में नहीं। एक बाद की बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के दो पंख बताए: ईश्वर में विश्वास और सामाजिक न्याय। किशोरावस्था की खोज दशकों के काम का केंद्र बन गई।
सारा की कहानी इसलिए प्रेरक है कि यह अज्ञान से तत्काल उत्तर की छलाँग नहीं है। यह एक छोटी गलतफहमी जाँचने से शुरू होती है, मूल स्रोतों और कठिन धार्मिक प्रश्नों से गुजरती है, और प्रार्थना में दिखे अर्थ तक पहुँचती है। इस्लाम ने हर कठिनाई मिटाई नहीं, लेकिन अध्ययन, इबादत और सार्वजनिक सेवा को एक-दूसरे का सहारा बनाने वाला मार्ग दिया।
उनकी यात्रा एक व्यावहारिक प्रश्न छोड़ती है: क्या हम दूसरे धर्म को विरासत में मिली तस्वीर से जानते हैं, या उसके स्रोतों और उसे जीने वालों की गवाही से? उनका मार्ग एक छोटे दावे को जाँचने के साहस से शुरू हुआ। वह तब परिपक्व हुआ जब वर्षों की इच्छा—ईश्वर के लिए जीना—इबादत, जिम्मेदारी और सार्वजनिक भलाई के काम में बदल गई।
यह कहानी किस प्रश्न का उत्तर देती है?
क्या धार्मिक संस्था पर भरोसा टूटने से ईश्वर में विश्वास भी समाप्त होना चाहिए? सारा के अनुभव में विश्वास बचा रहा और पीड़ा ने उन्हें जाँचने के लिए प्रेरित किया। ईश्वर, तौबा और नबियों की निरंतर परंपरा पर इस्लामी शिक्षाओं ने उनके प्रश्नों को उत्तर दिया; फिर सज्दा उस खोज का दृश्य रूप बना—जीवन को ईश्वर के सामने समर्पित करना।
स्रोत
फ़ोटो: Ahmed Nishaath / Unsplash.
