इवॉन रिडली: उन्होंने कुरआन आपत्ति खोजने के लिए खोला था
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इवॉन रिडली का बचपन उत्तर-पूर्वी इंग्लैंड में बीता। वे डरहम के एक खनिक की बेटी थीं। इस्लाम से पहले वे ईश्वर में विश्वास करती थीं और स्वयं को आचरण करने वाली ईसाई बताती थीं; लगभग महीने में दो बार चर्च जाती थीं। साथ ही उन्होंने ब्रिटिश पत्रकारिता में कठिन रास्ता बनाया—स्थानीय अख़बारों से शुरुआत की, फिर डेली मिरर, न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड और संडे टाइम्स जैसे राष्ट्रीय संस्थानों में काम किया और संडे एक्सप्रेस की मुख्य संवाददाता बनीं। उनका पेशा घटनास्थल तक पहुँचने, स्वीकृत कथाओं को परखने और ख़बर की जोखिम उठाने पर टिका था।
सितंबर 2001 के अंत में, ग्यारह सितंबर के हमलों के कुछ ही सप्ताह बाद, वे युद्ध की आशंका के बीच आम लोगों की स्थिति पर रिपोर्ट करने के लिए भेष बदलकर अफ़ग़ानिस्तान गईं। वे तैंतालीस वर्ष की और एक माँ थीं, फिर भी पत्रकार का आवेग जोखिम पर भारी पड़ा। लौटते समय एक चौकी पर उनका कैमरा दिखाई दे गया। तालिबान ने उन्हें दस दिन हिरासत में रखा—पहले जलालाबाद और फिर काबुल में। उन्होंने उस समय के अपने रूप को भयभीत, क्रोधित और प्रतिरोधी बताया; वे आध्यात्मिक अनुभव खोजने नहीं गई थीं।
हिरासत में एक धर्मगुरु ने पूछा कि क्या वे मुसलमान होना चाहती हैं। रिडली ने कैदी रहते जीवन बदलने वाला निर्णय लेने से इनकार किया, लेकिन वादा किया कि रिहा हुईं तो क़ुरआन पढ़ेंगी। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि वादा दबाव में किया गया था और बाहर निकलने में मदद करने वाली बात कहने को तैयार थीं। यह भेद आवश्यक है: कैद उनके इस्लाम स्वीकार करने की घड़ी नहीं थी, न उन्होंने वहाँ के व्यवहार को धार्मिक प्रमाण माना।
ब्रिटेन लौटकर वे उस वादे को डर के साथ समाप्त हुई बात मान सकती थीं, पर उन्होंने उसे निभाया। एक पेशेवर प्रश्न भी सामने था: इस्लामी दुनिया की केंद्रीय किताब पढ़े बिना उसके बारे में अधिकारपूर्वक कैसे लिखा जा सकता है? इसलिए उन्होंने पहले से तय निष्कर्ष लेकर नहीं, बल्कि किसी दावे को जाँचने वाली पत्रकार की आदत से पढ़ना शुरू किया।
वे इस्लाम के बारे में नकारात्मक धारणाएँ लेकर क़ुरआन के पास पहुँचीं, विशेषकर महिलाओं और हिंसा के विषय में। वे देखना चाहती थीं कि समाचारों और रीति-रिवाजों में धर्म से जोड़ा गया उत्पीड़न वास्तव में मूल पाठ में है या नहीं। पढ़ाई सहायक पुस्तकों और व्याख्याओं तक फैली। ईसाई परंपरा से परिचित पैग़म्बरों के वृत्तांत, न्याय और ईश्वर के सामने उत्तरदायित्व के विषय ने उनका ध्यान खींचा। उनके शब्दों में “अकादमिक अभ्यास” धीरे-धीरे आध्यात्मिक यात्रा बन गया।
निर्णायक परिवर्तन यह था कि किताब ने उनका पहले से बना फैसला पुष्ट नहीं किया। उनकी गवाही के अनुसार, उन्हें महिलाओं के आध्यात्मिक मूल्य और ज्ञान के अधिकार की पुष्टि मिली, न कि वह मामला जिसकी वे अपेक्षा कर रही थीं। पैग़म्बर मुहम्मद के विदाई संदेश में समानता का अर्थ भी उन्हें प्रभावित करता रहा। उनके प्रश्न किसी के चुप कराने से नहीं मिटे; विरासत में मिली छवि को स्वयं पढ़े स्रोत से मिलाने पर उनकी दिशा बदल गई।
इसीलिए रिडली ने इस विश्वास को “स्टॉकहोम सिंड्रोम” से समझाने वाली बात अस्वीकार की। वे कोई चिकित्सकीय निदान नहीं दे रही थीं, बल्कि अपने चुनाव की आसान व्याख्या का विरोध कर रही थीं। उन्होंने कहा कि अपहरणकर्ताओं से उनका लगाव नहीं बना, जेल में उन्होंने धर्म परिवर्तन से इनकार किया और स्वतंत्र होने के बाद इस्लाम पढ़ा। हिरासत और निर्णय के बीच लगभग दो वर्ष थे। यही अंतर कहानी का केंद्र है: डर में वादा हुआ; स्वतंत्रता में अध्ययन और चुनाव।
जुलाई 2003 में उन्होंने लंदन के एक घर में पाँच से कम समर्थकों की छोटी मंडली के सामने शहादा पढ़ा। अवसर निजी था और खाड़ी में नौकरी के लिए रवाना होने से एक दिन पहले हुआ। स्रोत जुलाई का निश्चित दिन प्रकाशित नहीं करते, इसलिए वह बनाया नहीं जा सकता। इतना स्पष्ट है कि लंबे समय से बन रही धारणा उस क्षण स्पष्ट घोषणा बनी—केवल ईश्वर की उपासना और उसके रसूल का अनुसरण।
परिवार की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं थी। उन्होंने बताया कि एक बहन ने साथ दिया, जबकि दूसरी ने उस समय बात करना बंद कर दिया। पिता पहले क्रोधित हुए, फिर विदाई संदेश पढ़कर उसमें समानता से प्रभावित हुए; माँ वापस चर्च जाने लगीं। ये बातें परिवार को खलनायक नहीं बनातीं, बल्कि दिखाती हैं कि निर्णय की कीमत थी और शहादा के बाद संवाद समाप्त नहीं हुआ।
नई ज़िंदगी व्यवहार में उतरी। उन्होंने नमाज़ सीखी, हिजाब अपनाया, शराब छोड़ी और लंबे संघर्ष के बाद धूम्रपान भी छोड़ दिया। उनके अनुसार इस्लाम ने आत्मविश्वास और स्पष्टता दी, पर उन्हें तीखी सार्वजनिक निगरानी में भी ला खड़ा किया; लोग अब उनके काम और विचारों को धर्म परिवर्तन के चश्मे से पढ़ते थे। फिर भी उन्होंने पत्रकारिता और सार्वजनिक काम जारी रखा, मीडिया निर्माण किया और युद्ध, राजनीति व मुस्लिम समाजों पर रिपोर्ट और वक्तव्य देती रहीं।
अनुभव ने उनसे यह नहीं कहलवाया कि हर मुसलमान इस्लाम का प्रतिनिधि है, या अफ़ग़ानिस्तान में उनके साथ हुई हर बात अच्छी थी। बदला उनका मापदंड: उन्होंने ग्रंथ और अनुयायियों के काम, कैद और बाद की खोज, तथा क्षणिक भावना और उपासना, आदत, काम व रिश्तों में परखी आस्था के बीच भेद किया। इसलिए “तालिबान की कैदी जिसने इस्लाम अपनाया” बहुत छोटा परिचय है; वह निर्णय बनाने वाले दो वर्षों को मिटा देता है।
रिडली की कहानी इसलिए प्रेरक है कि उन्होंने क़ुरआन सांत्वना खोजने के लिए नहीं, एक आपत्ति जाँचने के लिए खोला। उनके पास मजबूत छवि थी, फिर भी उन्होंने माना कि वह अधूरी हो सकती है। निर्णय बदलने पर वे बौद्धिक प्रशंसा पर नहीं रुकीं; चुनाव को दैनिक जीवन में उतारा और पारिवारिक व पेशेवर प्रश्नों की कीमत उठाई। सीख यह नहीं कि डर आस्था पैदा करता है, बल्कि यह कि डर के बाद मनुष्य स्वतंत्रता वापस पा सकता है, स्रोत को निष्पक्षता से जाँच सकता है और अपेक्षा उलटने पर भी सत्य मानी बात का अनुसरण कर सकता है।
स्रोत
Religioscope — Islam: from Taliban captive to Muslim feminist — Interview with Yvonne Ridley · The Guardian — The strange case of the Taliban captive who converted · The Independent — Abu Hamza called me. He was so sweet · Hiba Magazine — Interview with Yvonne Ridley
