केइको सोएदा: वह आस्था जिसमें अपनी जड़ों के लिए भी जगह थी

सिंगापुर में केइको सोएदा दो भाषाओं और संस्कृतियों के बीच जीना सीख रही थीं। वह जापान से पढ़ने आई थीं। इस्लाम उनके विश्वविद्यालयी शोध में भी आया और उन लोगों के जीवन में भी दिखा जो उसका पालन करते थे। मुस्लिम कन्वर्ट्स एसोसिएशन की रविवार की कक्षाओं ने सीखने का अवसर दिया। वह धर्म को विवाह से पहले की औपचारिकता नहीं बनाना चाहती थीं; वह अपने चुनाव को समझना और वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों से अलग उसे बनाए रखना चाहती थीं।
Have Halal, Will Travel को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि इस्लामी शिक्षाएँ उन मूल्यों के निकट थीं जिनके साथ वह बड़ी हुई थीं। फिर भी कुछ व्यवहार नए थे—नमाज़, हलाल भोजन और अलग जीवन-व्यवस्था। उन्होंने बताया कि विवाह से एक वर्ष पहले उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया, ताकि उनकी आस्था की अपनी स्वतंत्र नींव हो। यह यात्रा 1990 के दशक में हुई।
2016 में लेखक शेख कादिर द्वारा प्रकाशित कथन में उनके अनुभव का एक और पक्ष सामने आया। उन्होंने समझाया कि अल्लाह के सुंदर नामों को जानने से उन्हें अल्लाह को पहचानने का अर्थ समझने में सहायता मिली। उन्हें यह भी महत्त्वपूर्ण लगा कि वह जहाँ हों, सीधे अल्लाह से दुआ कर सकती हैं। यह उनके लिए आस्था का निजी अर्थ था, केवल किसी परिवार या समुदाय का हिस्सा बनना नहीं।
नई ज़िंदगी व्यावहारिक प्रश्न भी लाई। बाद में उन्होंने हलाल सामग्री खोजने, कार्यस्थल पर नमाज़ की जगह जानने और अपनी जापानी पहचान को बचाए रखने की चिंता को याद किया। उन्हें ऐसे लोगों की संगत चाहिए थी जो इन बदलावों को अनुभव से समझते हों। कभी सहायता का रूप बहुत साधारण होता है—एक उपयोगी पता, प्रश्न पूछ सकने वाली मित्र या उसी कठिनाई से गुज़रे किसी व्यक्ति का अनुभव।
जापान में परिवार से उनका संबंध इस जीवन का हिस्सा बना रहा। 2017 के एक साक्षात्कार में उन्होंने और उनके पति ने जापान की यात्राओं और परिवार द्वारा उनके भोजन का ध्यान रखने की बात कही। ये आपसी सम्मान के रोज़मर्रा के रूप थे। अलग चुनावों के बावजूद परिवार को साथ बैठने की जगह मिली और साझा भोजन में सम्मान दिखाई दिया।
2023 में BERITA Mediacorp से बात करते हुए उन्होंने जापान में माता-पिता से दूर आने को याद किया। स्वयं माँ बनने पर वह बेहतर समझ सकीं कि माता-पिता ने उनके लिए क्या किया था। बातचीत और मुलाक़ातों ने दूरी के बावजूद निकटता बनाए रखी। सिंगापुर में जापानी मुसलमानों के लिए स्थापित सकुरा क्लब ने दूसरा सहारा दिया, जहाँ लोग मिलते, अनुभव बाँटते और एक-दूसरे की मदद करते थे।
उन्होंने बच्चों के लिए लिखकर भी इस जीवन को दूसरों के लिए परिचित बनाया। उनकी पुस्तक When Nasi Lemak Meets Sushi ने उनके बेटे की दुनिया के माध्यम से जापान, सिंगापुर और इस्लाम पर बात की। पुस्तक के बारे में उन्होंने आशा व्यक्त की कि पाठक नया ज्ञान पाकर दूसरों के प्रति अपनी धारणा को समृद्ध करेंगे। साधारण अनुभव भिन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को समझने का निमंत्रण बन सकते हैं।
2025 के एक सांस्कृतिक आयोजन में उन्होंने विभिन्न देशों और समुदायों के मुसलमानों को एक-दूसरे से मिलने के लिए प्रोत्साहित किया। इन अलग-अलग समय की गवाहियों में, जिस आस्था को वह पहले अपने लिए समझना चाहती थीं, वही दूसरों को प्रश्न करने और जुड़ने की जगह देने वाले काम से भी जुड़ी। उनकी कहानी धैर्य से सीखने और ऐसी संगत को साथ लाती है जो नई शुरुआत का अकेलापन कम कर देती है।
स्रोत
- Cheryl Chiew / ZULA — Japanese-Malay couple interview, 14 November 2019; updated 6 December 2023
- Have Halal, Will Travel — Keiko Soeda interview, 26 December 2019; updated 6 May 2020
- Shaik Kadir — Practical Islam: book on Allah released, 29 June 2016
- Muhd Hazman Abd Aziz / Berita Harian — Sakura Club and Japanese converts, 13 April 2026
- Shaik Kadir — Islam is rising in the Land of the Rising Sun, 25 February 2017
- Nurfazirah Azman / BERITA Mediacorp — Sakura Club support network, 25 June 2023
- Nazirah Nurfatin Jamzuri / BERITA Mediacorp — When Nasi Lemak Meets Sushi, 5 March 2023
- Nazirah Nurfatin Jamzuri / BERITA Mediacorp — multicultural community gathering, 20 July 2025
