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आयशा रोज़ाली: मस्जिद के दरवाज़े से आगे, पुरानी धारणाओं के पार

गर्म रोशनी में कालीन पर रखा बंद कुरआन
चित्र: Qur’an still life — Malik Shibly / Unsplash (Unsplash लाइसेंस).

आयशा रोज़ाली एक यात्री के रूप में इस्तांबुल पहुँची थीं। उनका किसी धर्म की तलाश करने का इरादा नहीं था। ब्रिटेन के एक धर्मनिरपेक्ष परिवार में पली आयशा ने अभिनय और फ़िल्मों को कई वर्ष दिए थे। उन्होंने लॉस एंजेलिस में पढ़ाई की और फ़िल्म जगत के अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया। भविष्य की उनकी कल्पना में पर्दे पर दिखाई देना शामिल था। शहर घूमने का एक दिन उनके सामने अनपेक्षित सवाल खोलने वाला था।

घूमने की जगहें खोजते हुए उन्होंने सुल्तान अहमद मस्जिद, यानी ब्लू मॉस्क, जाने का फैसला किया। लेकिन उसके दरवाज़े पर पहुँचकर उन्हें झिझक हुई। 2021 में अनादोलु को दिए साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि इस्लाम के बारे में उनकी अधिकतर जानकारी मीडिया से आई थी और उन्हें डर था कि भीतर उनका स्वागत नहीं होगा। सिर ढककर वह अंदर गईं। नमाज़ियों को देखते हुए उन्हें ऐसा सुकून मिला जो उनकी पहले से बनी छवि से अलग था।

अपनी यात्रा के निजी वर्णन में उन्होंने लोगों के हाथों में दिखने वाली तस्बीह के प्रति जिज्ञासा का ज़िक्र किया। उन्होंने उसका उपयोग खोजा और मस्जिद में बैठकर ज़िक्र, यानी अल्लाह का स्मरण, करने की कोशिश की। बाहर निकलते समय अज़ान सुनाई दी। उन्होंने बताया कि उसकी आवाज़ ने उन्हें ठिठकने पर मजबूर कर दिया। अब उनके सामने इबादत का एक ऐसा अनुभव था जिसे वह सीधे जान सकती थीं।

इसके बाद पढ़ना शुरू हुआ। उन्हें क़ुरआन के अर्थों का अंग्रेज़ी अनुवाद मिला और उनके अनुसार उन्होंने उसे पूरा पढ़ा। लंदन लौटने के बाद भी इस्लाम को समझने का सिलसिला जारी रहा। मस्जिद की यात्रा और अंतिम निर्णय के बीच खोज का समय था; उन्होंने 2020 में इस्लाम स्वीकार किया। पहली मुलाक़ात के बाद अध्ययन हुआ और फिर उस समझ ने व्यक्तिगत निर्णय का रूप लिया।

उनके परिवार और आसपास के लोगों को आश्चर्य हुआ। अनादोलु से बातचीत में उन्होंने घर में उठने वाले सवालों और आपत्तियों का उल्लेख किया, जिन्होंने उन्हें और सीखने के लिए प्रेरित किया। वह चाहती थीं कि उनकी समझ और उनका व्यवहार लोगों को उनके निर्णय को समझने में मदद करे। इसलिए इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी सीखना जारी रहा, साथ ही उन लोगों से संवाद भी जो उन्हें पहले के जीवन से जानते थे।

मार्च 2021 के साक्षात्कार तक मीडिया में उनकी रुचि ने नई दिशा ले ली थी। उन्होंने अभिनेत्री बनने का सपना छोड़ने और इस्लाम से जुड़ी सामग्री तैयार करने की बात कही। इसमें इस्लाम स्वीकार करने वाले दूसरे लोगों की कहानियाँ भी शामिल थीं। जीवन में आए बदलाव को उन्होंने एक नई शुरुआत की तरह बताया। कहानी कहने और फ़िल्म बनाने के साधन बने रहे; उनसे वह जो कहना चाहती थीं, वह बदल गया था।

उनकी कहानी एक साधारण यात्रा से शुरू होकर मुलाक़ात, अध्ययन, निर्णय और निरंतर सीखने तक पहुँचती है। जिस दरवाज़े पर वह ठिठकी थीं, वहीं से उन्होंने अपनी पुरानी धारणाओं को अनुभव की कसौटी पर रखना शुरू किया। यह सफ़र पाठक के सामने भी एक सवाल रखता है: किसी धर्म के मूल स्रोत पढ़ने या उसके मानने वालों से मिलने से पहले हम उसके बारे में कितनी धारणाएँ बना लेते हैं?

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