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आंद्रिय ‘अनवर’ देरकाच: जब एकेश्वरवाद ने आस्था और बुद्धि में मेल कराया

काग़ज़ों और लेखन-सामग्री वाली खाली मेज़

यूक्रेनी पत्रकार आंद्रिय देरकाच, जो बाद में अनवर नाम से जाने गए, युवावस्था में ऑर्थोडॉक्स पादरी बनने के बहुत क़रीब थे। एक पादरी ने उन्हें ल्वीव के सेमिनरी में प्रवेश दिलाने में सहायता की पेशकश की, और वे भीतर से मठवासी जीवन तक के लिए तैयार थे। फिर वे तीन वर्ष से अधिक पश्चिमी यूरोप में रहे, जहाँ उपवास करते, चर्च जाते और अपनी सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक कार्यों में दान देते रहे।

धार्मिक अभ्यास मौजूद था, पर एक सिद्धांतगत प्रश्न उन्हें लगातार परेशान करता था। उन्होंने कहा कि वे समझ नहीं पाते थे कि पवित्र आत्मा और मरियम से जन्मे यीशु को सृष्टिकर्ता के साथ ईश्वर कैसे माना जा सकता है। उन्हें आस्था और बुद्धि के बीच तीखा टकराव महसूस होता था। रविवार की उपासना के बाद वे ईश्वर से प्रार्थना करते कि उन्हें वैसा बना दे जैसा ईश्वर चाहता है।

2005–2006 में BBC की यूक्रेनी सेवा में पत्रकार के रूप में काम करते समय वे इस्लाम के क़रीब आए। उनके अनुसार उन्होंने जाना कि इस्लाम दूसरे धर्मों के विरुद्ध नहीं है, जैसा मीडिया में प्रायः दिखाया जाता था, बल्कि ईश्वर के इनकार के विरुद्ध है। फिर उन्होंने एलमीर कुलियेव का रूसी क़ुरआन अनुवाद पढ़ा। उन्होंने कहा कि पढ़ते समय वे रो पड़े, क्योंकि पाठ ने उस बात को शब्द दिए जिसे वे भीतर से जानते थे पर व्यक्त नहीं कर पाते थे।

उनके बताए अनुसार निर्णायक तत्व एकेश्वरवाद था। तौहीद ने उनके भीतर आस्था और बुद्धि का मेल कराया और वर्षों से धारण किए हुए विचार को छोड़ने की शक्ति दी। मई 2011 में उन्होंने कहा कि वे चार वर्ष पहले मुस्लिम बने थे; इससे समय लगभग 2007 ठहरता है, जबकि कोई प्रकाशित दिन या महीना उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने इस निर्णय को अपनी यूक्रेनी पहचान छोड़ना नहीं माना। जब पूछा गया कि इस्लाम और राष्ट्रीय पहचान साथ कैसे रह सकते हैं, तो उन्होंने कहा कि इस्लाम उन्हें यूक्रेनी होने से वैसे ही नहीं रोकता जैसे पुरुष होने से नहीं रोकता। उनके लिए अरबी सीखना क़ुरआन और नमाज़ के लिए था, जबकि व्यक्ति अपनी परिचित भाषा में दुआ कर सकता है।

2012 की एक बातचीत में उन्होंने स्वयं को अपने परिवार का पहला मुस्लिम बताया और यूक्रेन के नए मुसलमानों की कठिनाइयों पर चर्चा की: भौगोलिक दूरी, जुमे की नमाज़ तक सीमित पहुँच, संस्थागत प्रतिस्पर्धा और मीडिया की बनी-बनाई छवियाँ। ये उनकी पत्रकारिता के अनुभव से निकली समयबद्ध टिप्पणियाँ थीं, हर मुस्लिम या संस्था पर सार्वभौमिक निर्णय नहीं।

अनवर की कहानी किसी एक क्षण में सिमटती नहीं। वह गंभीर धार्मिक अभ्यास और दबाए न गए प्रश्नों से शुरू हुई, बार-बार की प्रार्थना, पेशेवर संपर्क और क़ुरआन-पाठ से गुज़री, और उस एकेश्वरवाद पर ठहरी जिसने उनके अनुसार आस्था और बुद्धि में मेल कराया। निर्णय के बाद पहचान का प्रश्न बचा रहा; उनके अनुभव का उत्तर था कि आस्था मनुष्य के जीवन को नया क्रम दे सकती है, बिना उसकी भाषा या मातृभूमि मिटाए।

स्रोत

फ़ोटो: William Warby / Unsplash.

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