सभी कहानियों पर वापस जाएँ

मोहम्मद आमिर: जब उस काम के बाद आत्ममंथन शुरू हुआ जिसे वह सही नहीं मान सके

एक स्थापत्य आंगन में मेहराबों की कतारें
चित्र: Hasan Almasi · Unsplash लाइसेंस

बलवीर सिंह ने बाद में बताया कि युवावस्था में मुसलमानों के प्रति उनकी सोच शत्रुतापूर्ण थी और वे कठोर राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़े थे। उनके बार-बार दिए गए बयान के अनुसार, 6 दिसंबर 1992 को वे अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई में शामिल थे। लेकिन घर लौटने के बाद विजय का भाव टिक नहीं पाया। परिवार ने उनके कृत्य की निंदा की और उन्हें लगने लगा कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लेकर ऐसा काम किया है जिसका अब बचाव नहीं किया जा सकता।

यह झटका लंबे आत्ममंथन में बदल गया। उनके अनुसार मन की शांति चली गई और बेचैनी बढ़ती रही। बाद में साथी योगेंद्र पाल ने उन्हें मौलाना कलीम सिद्दीकी से मिलवाया। आमिर का साक्षात्कार लेने वाले एक पत्रकार के मुताबिक, वे पहले से इस्लाम स्वीकार करने का निर्णय लेकर नहीं गए थे; वे दुआ या अपनी परेशानी से राहत चाहते थे। आमिर ने कहा कि आलिम की सच्चाई, शांत आचरण और उन्हें समझने के धैर्य ने मुलाकात की दिशा बदल दी।

बलवीर ने 1993 में इस्लाम स्वीकार किया और बाद में मोहम्मद आमिर नाम अपनाया। बाद की दो बातचीतों में उन्होंने 1 जून की तारीख बताई, पर एक पहले प्रकाशित विस्तृत साक्षात्कार में जून में मुलाकात और उसके बाद कुछ महीनों के ठहराव के पश्चात निर्णय का क्रम मिलता है। इसलिए 1993 निश्चित है, लेकिन दिन और घटनाओं का सटीक क्रम विवादित है। सभी विवरणों में फैसला धीरे-धीरे हुई समीक्षा का परिणाम दिखाई देता है।

उन्होंने बताया कि धर्म परिवर्तन के बाद सामाजिक दबाव और पुलिस की परेशानियों का सामना करना पड़ा, और बाद में वे हैदराबाद चले गए। उन्होंने अपने नए जीवन को उस नुकसान की भरपाई से भी जोड़ा जिसे वे अपनी गलती मानते थे, और मस्जिदों के निर्माण या मरम्मत में भाग लिया। प्रकाशित स्रोत इन परियोजनाओं की संख्या पर एकमत नहीं हैं, इसलिए उनके प्रयास को किसी अनिश्चित संख्या के बजाय एक दीर्घकालिक दिशा के रूप में समझना अधिक उचित है।

बाद के सार्वजनिक वक्तव्यों में आमिर ने टकराव जारी रखने की बात नहीं की। उन्होंने विवाद से आगे बढ़ने और मुसलमानों तथा हिंदुओं के संबंध सुधारने का आग्रह किया। उनकी कहानी राजनीतिक शोर से परे एक शांत अर्थ छोड़ती है: आत्ममंथन तब शुरू हो सकता है जब मनुष्य अपने गलत काम को स्पष्ट नाम देता है, और संयमित चरित्र वह द्वार खोल सकता है जिसे बहस बंद रखती है। परिवर्तन की सच्चाई उसके बाद के चुनावों से परखी जाती है।

स्रोत

क़बस कथा-सूची पर लौटें