टोन्ये हागेन: नॉर्वे के छोटे नगर से कुरआन पढ़ने तक

टोन्ये मारी ड्यूपेविक हागेन नॉर्वे के एक छोटे नगर में पली-बढ़ीं, जहाँ कई गिरजाघर थे लेकिन कोई मस्जिद नहीं थी। घर और स्कूल में ईसाई धर्म परिचित वातावरण था: परिवार शाम को प्रार्थना करता, वह कभी-कभी संडे स्कूल जातीं और बचपन में बिना विशेष जाँच के स्वयं को ईसाई मानती थीं। फिर भी एक प्रश्न उनके साथ रहा—जीवन किस उद्देश्य पर खड़ा होना चाहिए?
अठारह वर्ष की आयु में यह प्रश्न व्यावहारिक हो गया। कई दिनों तक वह काग़ज़ और कलम लेकर बाहर बैठीं और सृष्टि, ईश्वर, भविष्य तथा उस मूल्य पर विचार किया जिसे वह कभी अपने भावी परिवार को देना चाहेंगी। कम साधनों के बावजूद कृतज्ञ रहने वाले लोगों से छोटी-छोटी मुलाक़ातों ने इस चिंता को गहरा किया। उनसे कोई नया धार्मिक निष्कर्ष तुरंत नहीं निकला, पर जीवन के उत्तरदायी अर्थ की खोज अधिक आवश्यक हो गई।
हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में एक मुस्लिम सहेली ने उनसे त्रित्व और बाइबल में उसके आधार के बारे में पूछा। टोन्ये के पास विस्तृत उत्तर नहीं था, इसलिए उन्होंने स्वयं सुसमाचार पढ़ने शुरू किए और फिर चर्च जाने लगीं। आरंभ में ये प्रश्न उन्हें अधिक जाँच करने वाली ईसाई बना रहे थे; वे इस्लाम के बारे में किसी जल्दबाज़ निर्णय की ओर नहीं बढ़ रही थीं।
पढ़ाई जारी रखने पर उन्हें लगा कि उनकी आपत्तियाँ दूर नहीं हो रही हैं। फिर उन्होंने कुरआन का नॉर्वेजियन अनुवाद खरीदा, परिचयात्मक सामग्री पढ़ी और इस्लाम पर एक ऑनलाइन पाठ्यक्रम लिया। ईश्वर, मार्गदर्शन और जवाबदेही पर कुरआन की सीधी भाषा ने उन्हें आकर्षित किया। यूसुफ़ की कथा और चिंतन का आह्वान उनकी बौद्धिक खोज को बचपन से चले आ रहे जीवन-उद्देश्य के प्रश्न से जोड़ते गए।
एक व्यावहारिक बाधा बाकी थी: उन्हें लगता था कि मुसलमान बनने से पहले नमाज़ और हर आवश्यकता में निपुण होना जरूरी है। क्रमिक सीखने पर एक पाठ ने उन्हें समझाया कि बदलाव के लिए तत्काल पूर्णता आवश्यक नहीं। इसने जाँच की जगह नहीं ली; जब मूल विश्वास उन्हें विश्वसनीय लग चुका था, तब इसने स्वयं लगाई हुई एक शर्त हटाई।
कुरआन का अनुवाद पूरा करने के बाद उन्होंने लिखा कि अब निर्णय टालने का कारण नहीं बचा था। उनका अपना वृत्तांत शहादा की तारीख 17 जून 2011 बताता है और उस समय उनकी उम्र उन्नीस वर्ष बताता है। [स्रोत]
तारीख़ सहित अपने वृत्तांत में उन्होंने निर्णय के बाद के समय को निरंतर सीखने और इबादत को धीरे-धीरे समझने की प्रक्रिया बताया। बाद में उनके पूरे नाम से प्रकाशित शैक्षणिक कार्य उनकी सार्वजनिक पहचान की पुष्टि करता है, पर उससे आज की निजी धार्मिक स्थिति का अनुमान नहीं लगाया जाता। उनकी कहानी का स्पष्ट शिक्षण यह है कि ईमानदार प्रश्नों को जल्दबाज़ी की जरूरत नहीं, और प्रतिबद्धता को सीखने वाले की पूर्णता तक टालना भी जरूरी नहीं।
स्रोत
- Tonje Hagen — How I Came to Islam, Part I (named first-person account)
- Tonje Hagen — How I Came to Islam, Part III: The Quest for Truth Leads to Shahada (named first-person account)
- Tamil Islamic Audio — The only Hijab in a Norwegian Village (republished continuous account)
- University of Agder repository — 2017 master's thesis by Tonje Marie Djupevik Hagen (public-name identity)
